arkadaşlık sitesi porno adana escort izmir escort porn esenyurt escort ankara escort bahçeşehir escort दत्तात्रेय जयंती तिथि, महत्व - दत्ता जयंती इतिहास !-- Facebook Pixel Code -->

दत्तात्रेय जयंती उत्सव

मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा का पर्व दत्त जयंती के रूप में बड़े ही धूम-धाम से मनाई जाती है। मान्यता अनुसार इस दिन भगवान दत्तात्रेय पृथ्वी लोक में अवतरित हुये थे। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों का स्वरूप माना जाता है। दत्तात्रेय में ईश्वर एवं गुरु दोनों रूप समाहित हैं जिस कारण इन्हें श्री गुरुदेवदत्त भी कहा जाता है।

श्री दत्तात्रेय यानी गुरु परंपरा के आदिगुरु,बल्कि ऐसा कह सकते हैं कि गुरु दत्तात्रेय का ही रूप हैं। नाथपंथ हो या फिर सूफी, सभी में गुरु रूप को बहुत महत्व दिया गया है। वैष्णव-शैव पंथ में भी गुरुस्वामी, गुरुराज, गुरुदेव ऐसा सम्मान उन्हें दिया जाता है। ऐसे ही गुरुओं के गुरु है श्री दत्तात्रेय। जिन्होंने ज्ञान और अध्यात्म का दालान सबके लिए खोल दिए हैं। सामाजिक समता और बंधुत्व के विचार की नींव श्री दत्तात्रेय ने ही रखी।

मान्यता अनुसार दत्तात्रेय का जन्म मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को प्रदोषकाल में हुआ था। श्रीमद्भगावत ग्रंथों के अनुसार दत्तात्रेय जी ने चौबीस गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की थी। भगवान दत्त के नाम पर दत्त संप्रदाय का उदय हुआ दक्षिण भारत में इनके अनेक प्रसिद्ध मंदिर भी हैं। मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को भगवान दत्तात्रेय के निमित्त व्रत करने एवं उनके दर्शन-पूजन करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

दत्तात्रेय स्वरूप:

दत्तात्रेय जयन्ती प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है. दत्तात्रेय के संबंध में प्रचलित है कि इनके तीन सिर हैं और : भुजाएँ हैं. इनके भीतर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश तीनों का ही संयुक्त रुप से अंश मौजूद है. इस दिन दत्तात्रेय जी के बालरुप की पूजा की जाती है। धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार तीनों देवियों पार्वती, लक्ष्मी तथा सावित्री जी को अपने पतिव्रत धर्म पर बहुत घमण्ड होता है ।अत: नारद जी को जब इनके घमण्ड के बारे में पता चला तो वह इनका घमण्ड चूर करने के लिए बारी-बारी से तीनों देवियों की परीक्षा लेते हैं जिसके परिणाम स्वरूप दत्तात्रेय का प्रादुर्भाव होता है।

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