धनतेरस पूजा

धनतेरस पर्व 2018 तिथि मुहूर्त उसका महत्व

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, धनतेरस पर लक्ष्मी पूजा प्रदोष काल (लक्ष्मी पूजा के लिए सबसे अच्छा मुहूर्त) में की जानी चाहिए। धनतेरस शब्द धनका ही एक स्वरुप है, जिसका अर्थ है धन और तेरासजिसका अर्थ तेरहवे अर्थात् 13वे, इसलिए यह हिन्दूओं के कार्तिक माह (अक्टूबर-नवंबर) में कृष्ण पक्ष के तेरहवें  दिन पर मनाया जाने वाला त्यौहार है, धनतेरस के दिन  पूजा सू अनुष्ठान सूर्यास्त और दिन के अंत के अगले एक घंटे और 43 मिनट के बाद शुरू की जाती है। धनतेरस पूजा को धनवंतरी त्रियोदशी, धनवंतरी जयंती पूजा, यमद्वीप और धनत्रयोदशी के रूप में भी कहा जाता है।

धनतेरस तिथि शुभ मुहूर्त:

धनतेरस भारत सहित दूसरे देशों में 5 नवंबर, सोमवार को मनाया जायेगा।

1. प्रदोष काल:-

सूर्यास्त के बाद के 2 घण्टे 24 की अवधि को प्रदोषकाल के नाम से जाना जाता है. प्रदोषकाल में दीपदान लक्ष्मी पूजन करना शुभ रहता है। 5 नवम्बर सूर्यास्त समय सायं 17:30 तक रहेगा. इस समय अवधि में स्थिर लग्न 18:10 से लेकर 20:09 तक वृषभ लग्न रहेगा. मुहुर्त समय में होने के कारण घर-परिवार में स्थायी लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

चौघाडिया मुहूर्त:-

5 नवम्बर 2018,

अमृ्त काल मुहूर्त 16:30 से 18:00 तक

चर 18:56 से लेकर 19:30 तक

उपरोक्त में लाभ समय में पूजन करना लाभों में वृ्द्धि करता है. शुभ काल मुहूर्त की शुभता से धन, स्वास्थय आयु में शुभता आती है. सबसे अधिक शुभ अमृ्त काल में पूजा करने का होता है।

सांय काल में शुभ महूर्त: 

प्रदोष काल का समय 17:31 से 20:04 तक रहेगा, स्थिर लग्न 18:10 से 20:09 तक रहेगा. धनतेरस की पूजा के लिए उपयुक्त समय 18:10 से 20:04 के मध्य तक रहेगा.

धनतेरस पर परम्परा:

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार हिंदुओं द्वारा इस समारोह के अनुसरण करने के पीछे विभिन्न रीति रिवाजों और परंपराओं की किस्में है। लोग नयी चीजें जैसें सोने चॉदी के सिक्के, गहने, नये बर्तन और अन्य नयी वस्तुओं को खरीदने को अच्छा विचार मानते है। लोगो का मानना है कि घर में नयी चीजें लाना पूरे वर्ष के लिये लक्ष्मी को लाने की पहचान है। लक्ष्मी पूजा शाम को की जाती है, और लोग बुरी आत्माओं परछाई को दूर करने के लिये विभिन्न दीये जलाते है। लोग बुरी शक्तियों को भी दूर करने के लिये भक्ति के गाने, आरती और मंत्र गाते है।

धनतेरस कैसे मनायी जाती:

इस महान अवसर पर लोग सामान्यतः अपने घरों की मरम्मत कराते है, साफ सफाई और पुताई कराते है, आंतरिक और बाहरी घर सजाते है, रंगोली बनाते है, मिट्टी के दीये जलाते है और कई और परंपराओं का पालन करते है। वे अपने घर धन और समृद्धि लाने के लिए देवी लक्ष्मी के तैयार किए गए पैरों के निशान चिपकाते हैं। सूर्यास्त के बाद, देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश जी की गुलाब और गेंदें के फूलों की माला, मिठाई, घी के दिये, धूप-दीप, अगरबत्ती, कपूर को अर्पित करके समृद्धि, बुद्धिमत्ता और अच्छे के लिये पूजा करते है।लोग देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश के मंत्रोंच्चारण, भक्ति गीत और आरती गाते है। नये कपङे और गहने पहनकर जुऍ का खेल खेलते है।

धनतेरस मनाने की पौराणिक कथा:

धनतेरस का जश्न मनाने के पीछे पौराणिक कथा, राजा हिमा के 16 साल के बेटे की कहानी है। उसके बारे में ऐसी भविष्य वाणी हुई थी कि उसकी मृत्यु शादी के चौथे दिन सॉप द्वारा काटने पर होगी। उसका पत्नी बहुत चालाक थी, उसने अपने पति का जीवन बचाने का रास्ते खोज लिया था। उसने उस विशेष दिन अपने पति को सोने नहीं दिया। उसने अपने सभी सोने चॉदी के बहुत सारे आभूषण और सिक्के इकट्ठे किये और अपने शयन कक्ष के दरवाजे के आगे ढेर बना दिया और कमरे में प्रत्येक जगह दीये जला दिये। अपने पति को जगाये रखने के लिये उसने कहानियॉ सुनायी। मृत्यु के देवता, यम साँप के रुप में वहॉ पहुंचे। गहनें और दीयों के प्रकाश से उनकी आँखें चौंधिया गयी। वह कमरे में घुसने में पूरी तरह असमर्थ थे, इसलिये उन्होनें सिक्कों के ढेर के ऊपर से कूद कर जाने का निश्चय किया। किन्तु राजकुमार की पत्नी का गीत सुनने के बाद वे वहीं पूरी रात बैठ गये। धीरे धीरे सुबह हो गयी और वे बिना उसके पति को लिये वापस चलें गये। इस तरह उसने अपने पति के जीवन की रक्षा की, तभी उसी दिन से यह दिन धनतेरस के रुप में मनाया जाने लगा।

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