गुरु प्रदोष व्रत 2021 तिथियां, व्रत कथा और विधि

गुरु प्रदोष व्रत
प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि को प्रदोष काल के दौरान मनाया जाता है। यदि प्रदोष व्रत गुरुवार को पड़ता है, तो इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है।
अन्य नामगुरु वारा प्रदोषम
तिथित्रयोदशी
दिनगुरुवार
देवताभगवान शिव
तिथियाँ05 अगस्त 2021
02 दिसंबर 2021
16 दिसंबर 2021
विधिपूजा, उपवास, जागरण, दान, और प्रार्थना
लाभसफलता, ज्ञान, अच्छा स्वास्थ्य और दुश्मनों पर जीत

यदि प्रदोष व्रत गुरुवार को पड़ता है तो इसे गुरुवार प्रदोषम व्रत कहा जाता है। इस व्रत को रखने से शत्रुओं पर विजय पाने में मदद मिलती है और सफलता, ज्ञान और अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। गुरुवार प्रदोषम व्रत  कथा इस प्रकार है।

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गुरु प्रदोष व्रत कथा


इस कथा के अनुसार, एक बार इंद्र और वृतासुर ने अपनी-अपनी सेना के साथ एक-दूसरे से युद्ध किया। देवताओं ने दैत्यों को हरा दिया और उन्हें लड़ाई में पूरी तरह से नष्ट कर दिया। वृतासुर यह सब देखकर बहुत क्रोधित हुआ और वह स्वयं युद्ध लड़ने के लिए आ गया। अपनी शैतानी ताकतों के साथ उसने एक विशाल रूप धारण कर लिया, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था और वह देवताओं को धमकाने लगा। देवताओं को अपने सर्वनाश की आशंका हुई और वह मारे जाने के डर से भगवान बृहस्पति की शरण में चले गए। भगवान ब्रहस्पति हमेशा सबसे शांत स्वभाव वाले हैं। बृहस्पति जी ने देवताओं को धैर्य बंधाया और वृतासुर की मूल कहानी बताना शुरू किया- जैसे कि वह कौन है या वह क्या है?

बृहस्पति के अनुसार, वृत्रासुर एक महान व्यक्ति था- वह एक तपस्वी था, अपने प्रकार का था और अपने काम के प्रति बेहद निष्ठावान था। वृतासुर ने गंधमादन पर्वत पर तपस्या की और अपनी तपस्या से भगवान शिवजी को प्रसन्न किया। उस समय में, बृहस्पति जी के अनुसार, चित्ररथ नाम एक राजा था। एक बार चित्ररथ अपने विमान पर बैठे और कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान किया। कैलाश पहुँचने पर उनकी दृष्टि पार्वती पर पड़ी, जो उसी आसन पर शिव के बाईं ओर बैठी थीं।

शिव के साथ उसी आसन पर बैठा देखकर, उन्होंने इस बात का मजाक उड़ाया कि उसने कहा कि मैनें सुना है कि, जैसे मनुष्य मोह-माया के चक्र में फँस जाते हैं, वैसे स्त्रियों पर मोहित होना कोई साधारण बात नहीं है, लेकिन उसने ऐसा कभी नहीं किया, अपने जनता से भरे दरबार में राजा किसी भी महिला को अपने बराबर नहीं बिठातौ।

इन बातों को सुनकर, भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा कि दुनिया के बारे में उनके विचार अलग और काफी विविध हैं। शिव ने कहा कि उन्होंने दुनिया को बचाने के लिए जहर पी लिया। माता पार्वती उस पर क्रोधित हो गईं, इस तरह माता पार्वती ने चित्ररथ को श्राप दे दिया। इस श्राप के कारण चित्ररथ एक राक्षस के रूप में पृथ्वी पर वापस चला गया।

जगदम्बा भवानी के श्राप के कारण, चित्ररथ का जन्म एक राक्षस योनी में हुआ। ट्वेशता ऋषि ने तपस्या की और अपनी सर्वोत्तम तपस्या ने वृत्रासुर का निर्माण किया। वृतासुर बचपन से ही भगवान शिव का अनुयायी था और बृहस्पति देव के अनुसार जब तक इंद्र भगवान शिव और पार्वती को प्रसन्न करने के लिए बृहस्पति प्रदोष व्रत का पालन नहीं करता, उसे हराना संभव नहीं था।

देवराज इंद्र ने गुरु प्रदोष व्रत का पालन किया और वे जल्द ही वृतासुर को हराने में सक्षम हो गए और स्वर्ग में शांति लौट आई। अतः, महादेव और देवी पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को गुरुवार के दिन प्रदोष व्रत अवश्यक करना चाहिए।

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लाभ: गुरु प्रदोष व्रत शत्रुओं पर विजय पाने और सफलता, ज्ञान और अच्छे स्वास्थ्य लाने में मदद करता है।

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