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इंदिरा एकादशी 2021: तिथि, पूजा विधि और कहानी

इंदिरा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा होती है। इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। कहा जाता है कि इस दिन श्री हरि शयन करते हुए करवट लेते हैं। साथ ही इसे पद्मा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा करने व व्रत रखने से वाजपेय यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है। साथ ही मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं। 

इंदिरा एकादशी 2021 तिथि

इंदिरा एकादशी की विशेष पूजा की जाती है। यह एकादशी पितृ पक्ष में मनाई जाती है। मान्यता है कि इंदिरा एकादशी के व्रत से पितरों की मुक्ति होती है और साल 2021 में 3 अक्टूबर रविवार को इंदिरा एकादशी पड़ रही है.

एकादशी की अवधि 2 घंटे 22 मिनट और इसका मुहूर्त 06:14:47 से 08:36:54 तक रहेगा. इस व्रत से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार सतयुग में महिष्मती के राजा इंद्रसेन ने इंदिरा एकादशी का व्रत कर अपने पिता को स्वर्ग में स्थान दिया था।

इंदिरा एकादशी पूजा विधि

- एकादशी का व्रत और पूजन ब्रह्मा, विष्णु समेत तीनों लोकों की पूजा के समान है। इस व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है:

- एकादशी का व्रत रखने वाले मनुष्य को व्रत से एक दिन पूर्व दशमी तिथि पर सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए और रात्रि में भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए सोना चाहिए।

- व्रत वाले दिन प्रात:काल उठकर भगवान का ध्यान करें और स्नान के बाद व्रत का संकल्प लें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष घी का दीप जलाएं।

- भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी, ऋतु फल और तिल का उपयोग करें। व्रत के दिन अन्न ग्रहण ना करें। शाम को पूजा के बाद फल ग्रहण कर सकते हैं।

- व्रत के दिन दूसरों की बुराई करने और झूठ बोलने से बचें। इसके अतिरिक्त तांबा, चावल और दही का दान करें।

- एकादशी के अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय के बाद पारण करें और जरूरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन व दक्षिणा देकर व्रत खोलें।

 इंदिरा एकादशी की कथा

इंदिरा एकादशी व्रत में इस कथा को अवश्य सुनना चाहिए. पौराणिक कथा के अनुसार सतयुग में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा राज्य करता था. उसके राज्य का नाम महिष्मति था. महिष्मति राज्य में जनता को किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं था. प्रजा सुखपूर्वक रहती थी. राजा इंद्रसेन भगवान विष्णु का परम भक्त था. एक दिन नारद जी इंद्रसेन के दरबार में उपस्थित हुए और राजा को पिता का सदेंश सुनाया. नारद ने राजा को बताया कि उनके पिता यमलोक में हैं. पूर्व जन्म में उनसे कोई गलती हो गई थी जिस कारण वे यमलोक में रहने को विवश हैं. नारद ने राजा को उपाय बताते हुए कहा कि यदि इंद्रसेन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत रखें तो उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी. राजा ने नारद जी से इंदिरा एकादशी के व्रत के बारे में विस्तार से जानकारी देने का आग्रह किया. इस पर नारद जी ने कहा कि एकादशी तिथि से पूर्व दशमी को विधि विधान से पितरों का श्राद्ध करें. और एकादशी की तिथि को व्रत रखें और द्वादशी के दिन भगवान की पूजा के बाद दान आदि का कार्य करने के बाद व्रत का पारण करें. नारद जी ने इंद्रसेन से कहा कि इस तरह से व्रत करने से पिता को स्वर्ग प्राप्त होगा. राजा इंद्रसेन ने नारद के बताए हुए नियमों के अनुसार ही व्रत किया. एकादशी का व्रत रखने के कारण उनके पिता को स्वर्ग प्राप्त हुआ.

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