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जया पार्वती व्रत 2021: तिथि, व्रत विधि और कथा

जयापार्वती व्रत, देवी पार्वती के विभिन्न रूपों में से एक हैं। जयापार्वती व्रत को मुख्य रूप से गुजरात में मनाया जाता है। जयापार्वती का व्रत अविवाहित कन्याओं के साथ-साथ विवाहित स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है। अविवाहित कन्याएँ जयापार्वती व्रत का पालन सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिये करती हैं और विवाहित स्त्रियाँ इस व्रत को अपने पति की लंबी आयु एवं सुखी वैवाहिक जीवन के लिये करती हैं।

जया पार्वती 2021 तिथि

जयापार्वती व्रत आषाढ़ मास में लगातार पाँच दिनों तक मनाया जाता है। यह व्रत शुक्ल पक्ष त्रयोदशी से शुरू हो जाता है और पाँच दिवस पश्चात कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि पर खत्म होता है। जयापार्वती व्रत को पाँच, सात, नौ, ग्यारह तथा अधिकतम बीस सालों तक करने का सुझाव दिया जाता है। 

जया पार्वती व्रत की पूजा विधि

- आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी के दिन सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें। 

- तत्पश्चात व्रत का संकल्प करके माता पार्वती का ध्यान करें। 

- पूजा के स्थान पर शिव-पार्वती की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। 

- फिर भगवान शिव-पार्वती को कुंमकुंम, शतपत्र, कस्तूरी, अष्टगंध और फूल चढ़ाकर पूजा करें। 

- ऋतु फल तथा नारियल, अनार व अन्य सामग्री अर्पित करें। 

- अब विधि-विधान से षोडशोपचार पूजन करें।

- माता पार्वती का स्मरण करके स्तुति करें।  

- फिर मां पार्वती का ध्यान कर के सुख-सौभाग्य और गृह शांति के लिए सच्चे मन से प्रार्थना करें। 

- साथ ही मां पार्वती की कथा सुनें और आरती कर के पूजा को संपन्न करें। 

- उसके बाद ब्राह्मण को भोजन करवाएं और अपनी के इच्छा के अनुसार दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लें। 

- अगर बालू रेत का हाथी बनाया है तो रात्रि जागरण के पश्चात उसे नदी या जलाशय में विसर्जित करें। 

जया पार्वती व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार किसी समय कौडिन्य नगर में वामन नाम का एक योग्य ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सत्या था। उनके घर में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान नहीं होने से वे बहुत दुखी रहते थे। एक दिन नारद जी उनके घर आए। उन्होंने नारद की खूब सेवा की और अपनी समस्या का समाधान पूछा। तब नारद ने उन्हें बताया कि तुम्हारे नगर के बाहर जो वन है, उसके दक्षिणी भाग में बिल्व वृक्ष के नीचे भगवान शिव माता पार्वती के साथ लिंगरूप में विराजित हैं। उनकी पूजा करने से तुम्हारी मनोकामना अवश्य ही पूरी होगी। ब्राह्मण दंपत्ति ने उस शिवलिंग को ढूंढ़कर उसकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इस प्रकार पूजा करने का क्रम चलता रहा और पांच वर्ष बीत गए। एक दिन जब वह ब्राह्मण पूजन के लिए फूल तोड़ रहा था तभी उसे सांप ने काट लिया और वह वहीं जंगल में ही गिर गया। ब्राह्मण जब काफी देर तक घर नहीं लौटा तो उसकी पत्नी उसे ढूंढने आई। पति को इस हालत में देख वह रोने लगी और वन देवता व माता पार्वती को स्मरण किया। ब्राह्मणी की पुकार सुनकर वन देवता और मां पार्वती चली आईं और ब्राह्मण के मुख में अमृत डाल दिया, जिससे ब्राह्मण उठ बैठा। ब्राह्मण दंपत्ति ने माता पार्वती का पूजन किया। माता पार्वती ने उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें वर मांगने के लिए कहा। तब दोनों ने संतान प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। माता पार्वती ने उन्हें विजया पार्वती व्रत करने की बात कही। आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी के दिन उस ब्राह्मण दंपत्ति ने विधिपूर्वक माता पार्वती का यह व्रत किया, जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। इस दिन व्रत करने वालों को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है तथा उनका अखंड सौभाग्य भी बना रहता है। 

माना जाता है कि इस के अनुसार एक वामन नाम का ब्राह्मण रहता था। और इसकी पत्नी का नाम सत्या था। इनके घर में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी। केवल एक की ही कमी थी, और वो है उनकी संतान। बताया जाता है कि इनको कोई संतान नहीं होती थी। इसी वजह से वह बहुत ही परेशान रहते थे। एक दिन उनके घर नारद जी आए और उन्होनें नारद जी की बहुत सेवा की और अपनी समस्या का समाधान पूछा। उस समय नारद ने बताया की उनके नगर के बहार जो वन है। उसके दक्षिणी भाग में बिल्व वृक्ष के नीचे भगवान शिव माता पार्वती के साथ लिंगरूप में विराजित हैं। उनकी पूजा करने से तुम्हारी सारी मनोकामना पूरी हो जाएगी। साथ ही उस शिवलिंग को ढूंढ़कर उसकी पूजा पूरे विधि- विधान के साथ करें। इसी तरह पूजा करते करते इनको 5 साल हो गए। एक दिन जब ब्राह्मण पूजा करने के लिए पेड़ से फूल तोड़ रहा था तब ब्राह्मण को सांप ने काट लिया था तो वह उसी समय वहीं जगंल में गिर गया। बताया गया है इस कथा के अनुसार इस कथा में जो भी होता हैं। जो भी बताया गया है कि यह केवल एक कथा है। 

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