कार्तिक पूर्णिमा का महत्व

धर्म शास्त्रों के अनुसार यदि यानि आकाश मंडल में पूर्ण चाँद दिखाई देने वाले दिन को पूर्णिमा कहा जाता है जिसका हिन्दू धर्म में बेहद खास महत्व होता है। हिन्दू कैलंडर के मुताबिक इसी दिन पूर्णिमांता महीना खत्म होता है। पूर्णिमा को बहुत अच्छे और समृद्धि प्रदान करने वाले दिन के रूप में जाना जाता है। अलग अलग क्षेत्रों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है कोई इसे पौर्णिमी कहता है तो कोई पूर्णमासी। वर्ष भर में कुल 12 पूर्णिमा आती है जो एक महीने में एक बार आती है। पूर्णिमा को धार्मिक मान्यता के रूप में भी बहुत लाभकारी माना जाता है। बहुत से लोग इस दिन उपवास रखते है, अपने घरों में भगवान सत्यनारायण की कथा और पूजा आदि कराते है। बात करते हैं आज कार्तिक पूर्णिमा की  -  कार्तिक महीना पूरा ही त्योहारों और व्रतों का माना जाता है। इस महीने के 15वें दिन होती है पूरे चांद की पूर्णिमा। चांदनी रात की मनमोहक छटा के बीच कार्तिक पूर्णिमा का व्रत और पूजा की जाती है। इसी दिन श्री गुरु नानक देव प्रकाशोत्सव और श्री शत्रुंजय तीर्थ यात्रा भी शुरू होती है। कार्तिक पूर्णिमा के ही दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नाम के राक्षस को मारा था, जिसके बाद उनको त्रिपुरारी कह कर भी पूजा जाने लगा। त्रिपुरासुर ने तीनो लोकों में आतंक मचाया हुआ था, उसके मरने पर सभी देवताओं ने रोशनी जलाकर खुशियां मनाईं। उसी के मद्देनज़र इसे देव दिवाली भी कहा जाता है। वहीं पूर्णिमा के ही दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार भी लिया था। राधा-कृष्ण के भक्तों के लिये भी ये दिन काफी खास है। माना जाता है कि इस दिन राधा और कृष्ण ने रास किया था। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में शिवलिंग महाजल अभिषेक भी इसी दिन होता है।

कार्तिक पूर्णिमा कथा:

एक बार एक राक्षस था उसका नाम था त्रिपुर। त्रिपुर ने काफी साल तक ब्रह्मा जी की तपस्या की। तपस्या से खुश होकर ब्रह्मा जी ने उससे वर मांगने को कहा। त्रिपुर सुर ने कहा कि मैं ना तो देवताओं के हाथों मारा जाऊं और ना ही मनुष्य के हाथों। ब्रह्मा जी ने कहा तथास्तु। वरदात मिलते ही त्रिपुर ने अत्याचार करना शुरू कर दिये। अंत में उसने कैलाश पर्वत पर ही चढ़ाई कर दी। कैलाश पर भगवान शिव के साथ उसका युद्ध हुआ और त्रिपुरासुर का वध किया गया।

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