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कोकिला व्रत 2021: तिथि, व्रत कथा, विधि और महत्व

कोकिला व्रत आषाढ़ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह व्रत पूरे सावन में मनाया जाता है। इस व्रत में आदिशक्ति के स्वरूप कोयल की पूजा करने का विधान माना गया है। ऐसा माना गया है कि इस व्रत को करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। साथ ही शादी में आ रही बाधा भी दूर हो जाती है साथ ही वर भी योग्य मिल जाता है। आमतौर पर अविवाहित लड़कियों को यह व्रत जरूर करना चाहिए। 

कोकिला व्रत 2021 तिथि

कोकिला व्रत रखने से सुख़ , सौभाग्य , अखंड सौभाग्य , पुत्र , सुख़ – समृद्धि ,  पति पत्नी में प्रेम बढ़ता हैं | यह व्रत स्त्रियाँ के द्वारा किया जाता हैं | इस व्रत को करने से अहिल्या ने पाप मुक्ति पाई थी | माता सीता , माता रुक्मणी किर्तिमाला ने इस व्रत को किया था | इस साल कोकिला व्रत 23 जुलाई 2021 को मनाई जाएगी।

कोकिला व्रत विधि

सौभाग्यवती स्त्रियाँ इस व्रत को आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि से आरम्भ होकर श्रावण मास की पूर्णिमा को समाप्त होता है | व्रत के समय उबटन लगाकर नित्य प्रात: स्नान , एक समय भोजन , भूमि शयन ,ब्रह्मचार्य का पालन , प्राणियों पर दया , विधि विधान से पूजन करनी चाहिये |

कोकिला व्रत महत्व

कोकिला व्रत की ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से सभी सुखों की प्राप्ति संभव होती है। यह व्रत दांपत्य जीवन को खुशहाल होने का वरदान प्रदान करता है। इस व्रत के द्वारा मन के अनुरूप शुभ फलों की प्राप्ति होती है। शादी में आ रही किसी भी प्रकार की दिक्कत हो तो इस व्रत का पालन करने से विवाह का सुख प्राप्त होता है। यह व्रत योग्य वर की प्राप्ति कराने में सहायक बनता है।

कोकिला व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार अनंतकाल में राजा दक्ष के घर आदिशक्ति का सती के रूप में जन्म हुआ। इसके बाद उनका पालन पोषण उनके पिता ने अकेले खुद ने किया है। लेकिन जब सती की शादी की बात होता तो आई तो राजा दक्ष के न चाहने के बाद भी माता सती ने भगवान शिव से शादी कर ली थी। इसके कुछ समय बाद एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ किया, जिसमें माता सती और भगवान शिव को नहीं बुलाया गया। बताते है कि जब माता सती को इस बात का पता चला तो उन्होंने भगवान शिव से यज्ञ में जाने की अनुमति मांगी, लेकिन भगवान शिव ने उन्हें जानें की अनुमति नहीं दी। लेकिन जब माता सती हठ करने लगी तो भगवान शिव ने उन्हें जाने की अनुमति दे दी थी। इसके बाद माता सती यज्ञ स्थल पर पहुंची। जहां उनका कोई मान-सम्मान नहीं हुआ। साथ ही भगवान शिव के प्रति अपमान जनक शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया, जिससे माता सती अति कुंठित हुई। उस समय माता सती ने यज्ञ वेदी में अपनी आहुति दे दी। भगवान शिव को जब माता सती के सतीत्व का पता चसा तो उन्होनें माता सती को शाप दिया कि आपने मेरी इच्छाओं के विरुद्ध जाकर आहुति दी। लेकिन अब आपको भी वियोग में रहना पड़ेगा। उस समय भगवान शिव ने उन्हें 10 हजार साल तक कोयल बनकर वन में भटकनें का शाप दे दिया। कालांतर में माता सती कोयल बनकर 10 हजार साल तक वन में भगवान शिव की आराधना की। इसके बाद उनका जन्म पर्वतराज हिमालय के घर हुआ। अतः इस व्रत का विशेष महत्व है।

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