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महाराणा प्रताप जयंती 2021: तिथि, इतिहास और कहानी

महाराणा प्रताप मेवाड़ के महान हिंदू शासक थे। वे उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे। वे अकेले ऐसे वीर थे, जिसने मुग़ल बादशाह अकबर की अधीनता किसी भी प्रकार स्वीकार नहीं की। वे हिन्दू कुल के गौरव को सुरक्षित रखने में सदा तल्लीन रहे। वीरता और आजादी के लिए प्यार तो राणा के खून में समाया था क्योंकि वह राणा सांगा के पोते और उदय सिंह के पुत्र थे। राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास का सबसे चर्चित युद्ध हल्दीघाटी का युद्ध था जो मुगल बादशाह अकबर और महराणा प्रताप के बीच हुआ था। अकबर और महाराणा प्रताप की शत्रुता जगजाहिर थी। लेकिन इसके बावजूद जब अकबर को महाराणा प्रताप की मृत्यु की खबर मिली तो वो बिल्कुल मौन हो गया था और उसकी आँखों मे आंसू आ गए थे। वह महाराणा प्रताप के गुणों की दिल से प्रशंसा करता था।

महाराणा प्रताप जयंती 2021 तिथि

महाराणा प्रताप जयंती उत्तर भारत के राज्यों हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में ज्येष्ठ माह के 3 वें दिन एक क्षेत्रीय सार्वजनिक अवकाश है। इसका मतलब यह पश्चिमी कैलेंडर में 13 जून 2021 दिन रविवार होता है।

यह अवकाश 16 वीं शताब्दी में एक प्रख्यात शासक की जयंती का प्रतीक है जो मुगल साम्राज्य की ताकत के लिए खड़ा था।

महाराणा प्रताप जयंती का इतिहास

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान में हुआ था। उनके पिता महाराणा उदय सिंह द्वितीय थे, जो कि मेवाड़ राज्य के शासक थे, जिसकी राजधानी चित्तौड़ थी। 25 बेटों में सबसे बड़े के रूप में, प्रताप क्राउन प्रिंस थे।

1567 में, चित्तौड़ सम्राट अकबर के मुगल साम्राज्य से दुर्जेय बलों से घिरा हुआ था। महाराणा उदय सिंह द्वितीय ने चित्तौड़ को छोड़ने का फैसला किया, और मुगलों के लिए कैपिट्यूलेट करने के बजाय, गोगुन्दा में पश्चिम को स्थानांतरित कर दिया।

1572 में महाराणा उदय सिंह द्वितीय की मृत्यु हो गई, और अपने एक भाई के साथ सत्ता संघर्ष के बाद, प्रताप सिंह मेवाड़ के महाराणा बन गए।

महाराणा प्रताप की कथा

यूं तो महारणा प्रताप (महाराणा प्रताप की कहानी) के जीवन ऐसे कई किस्से हैं जो आज भी लोगों को प्रेरणा देते हैं। लेकिन उनमें से ये प्रताप की ये तीन कहानियां बेहद प्रसिद्ध हैं -

1. भाग खड़ी हुई अकबर की सेना -

महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ के किले में हुआ था। ये किला दुनिया की सबसे पुरानी पहाड़ियों की रेंज अरावली की एक पहाड़ी पर है। महाराणा का पालन-पोषण भीलों की कूका जाति ने किया था। भील राणा से बहुत प्यार करते थे। वे ही राणा के आंख-कान थे। जब अकबर की सेना ने कुम्भलगढ़ को घेर लिया तो भीलों ने जमकर लड़ाई की और तीन महीने तक अकबर की सेना को रोके रखा। एक दुर्घटना के चलते किले के पानी का स्त्रोत गन्दा हो गया। जिसके बाद कुछ दिन के लिए महाराणा को किला छोड़ना पड़ा और अकबर की सेना का वहां कब्ज़ा हो गया। लेकिन अकबर की सेना ज्यादा दिन वहां टिक न सकी और फिर से कुम्भलगढ़ पर महाराणा का अधिकार हो गया। 

2. महाराणा प्रताप का हाथी -

महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा, लेकिन उनका एक हाथी भी था। उसका नाम था रामप्रसाद। उस हाथी का उल्लेख अल- बदायुनी ने जो मुगलों की ओर से हल्दीघाटी के युद्ध में लड़ा था उसने अपने एक ग्रन्थ में किया है। वो लिखता है की जब महाराणा प्रताप पर अकबर ने चढ़ाई की थी तब उसने दो चीजों को ही बंदी बनाने की मांग की थी एक तो खुद महाराण और दूसरा उनका हाथी रामप्रसाद। वो हाथी इतना समझदार व ताकतवर था की उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था। उस हाथी को पकड़ने के लिए अकबर की सेना ने 7 बड़े हाथियों का एक चक्रव्यू बनाया और उन पर 14 महावतों को बिठाया तब कहीं जाके उसे बंदी बना पाये। उस हाथी को अकबर के समक्ष पेश  कि या गया जहां अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा। रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने और पानी दिया। पर उस स्वामिभक्त हाथी ने 18 दिन तक मुगलों का न ही दाना खाया और ना ही पानी पीया और वो शहीद हो गया। तब अकबर ने कहा था कि;- जिसके हाथी को मैं मेरे सामने नहीं झुका पाया उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाऊंगा।

3. चेतक का पराक्रम -

हल्दीघाटी के युद्ध में बिना किसी सैनिक के राणा अपने पराक्रमी चेतक पर सवार हो कर पहाड़ की ओर चल पडे़। उनके पीछे दो मुग़ल सैनिक लगे हुए थे, परन्तु चेतक ने अपना पराक्रम दिखाते हुए रास्ते में एक पहाड़ी बहते हुए नाले को लांघ कर प्रताप को बचाया जिसे मुग़ल सैनिक पार नहीं कर सके। चेतक द्वारा लगायी गयी यह छलांग इतिहास में अमर हो गयी इस छलांग को विश्व इतिहास में नायब माना जाता है। चेतक ने नाला तो लांघ लिया, पर अब उसकी गति धीरे-धीरे कम होती जा रही थी पीछे से मुग़लों के घोड़ों की टापें भी सुनाई पड़ रही थी उसी समय प्रताप को अपनी मातृभाषा में आवाज़ सुनाई पड़ी, ‘नीला घोड़ा रा असवार’ प्रताप ने पीछे पलटकर देखा तो उन्हें एक ही अश्वारोही दिखाई पड़ा और वह था, उनका सगा भाई शक्तिसिंह। प्रताप के साथ व्यक्तिगत मतभेद ने उसे देशद्रोही बनाकर अकबर का सेवक बना दिया था और युद्धस्थल पर वह मुग़ल पक्ष की तरफ़ से लड़ता था। जब उसने नीले घोड़े को बिना किसी सेवक के पहाड़ की तरफ़ जाते हुए देखा तो वह भी चुपचाप उसके पीछे चल पड़ा, परन्तु केवल दोनों मुग़लों को यमलोक पहुंचाने के लिए। जीवन में पहली बार दोनों भाई प्रेम के साथ गले मिले थे। इस बीच चेतक इमली के एक पेड़ के पास गिर पड़ा, यहीं से शक्तिसिंह ने प्रताप को अपने घोड़े पर भेजा और वे खुद चेतक के पास रुके रहे। कहते हैं यही चेतक ने अपने प्राण त्याग दिये। चेतक लंगड़ा (खोड़ा) हो गया, इसीलिए पेड़ का नाम भी खोड़ी इमली हो गया। कहते हैं, इमली के पेड़ का यह ठूंठ आज भी हल्दीघाटी में उपस्थित है।

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