पोंगल की पौराणिक कथा-पोंगल उत्सव के पीछे का रहस्य

पोंगल की पौराणिक कथा पोंगल उत्सव के पीछे का रहस्य भारत वर्ष का  दक्षिण भाग उनकी  सुंदरता, संस्कृति और परंपरा में निहित है। दक्षिणी राज्यों के लोग हमेशा अपनी परंपराओं को बिना किसी नवीनीकरण के मनाते हैं। दक्षिण भारतीयों को सबसे स्वच्छ, सहायक और कड़ी मेहनत करने वाले लोग कहे जाते है, और उनके रीति-रिवाज और परंपराएं भी हैं। इनमे से एक पोंगल त्योहार है जो कि दक्षिण भारत से लोगों का प्रतिनिधित्व करता है।

पोंगल त्यौहार कैसे शुरू हुआ? इसके पीछे की कहानी क्या है और पौराणिक संबंध क्या हैं?

भगवान शिव की कहानी -

भगवान शिव के वाहन नंदी जो बैल के रूप में सुशोभित हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार भगवान शिव ने अपने  वाहन बैल को बसवा नाम से पृथ्वी पर जाने और मनुष्यों से मिलने के लिए कहा। उन्हें यह संदेश व्यक्त करने के लिए कहा गया की मनुष्यों को नित्य दिन तेल मालिश और स्नान करना चाहिए। परन्तु गलती से,नंदी बैल ने  गलत तरीके से लोगों को बताया जाता है कि, उन्हें एक महीने में केवल एक बार भोजन करना चाहिए। बसवा के इस गलत व्यव्हार से भगवान शिव बहुत क्रोधित हुए   नतीजतन, भगवान शिव ने क्रोध के आवेश में आकर उन्हें खेतों में हमेशा के लिए जीने और अधिक भोजन बढ़ाने के लिए दंडित किया। जिस कारन से बैल खजेटों में हल जोतते हैं और  जोतने के नयी उपज होने में पोंगल पर्व मनाया जाता है।

भगवान इंद्र की कहानी -

कथाओं के अनुसार एक बार भगवान श्री कृष्ण जी ने अपनी बाल अवस्था में  इंद्र देव को एक सबक सिखाने का फैसला किया, क्योंकि वह सभी देवताओं के राजा बनने के बाद अहंकारी बन गए थे। भगवान कृष्ण ग्वाल-बालों के संग से सभी सभी से कहा की भगवान इंद्र की पूजा नहीं करनी है। सभी जानो ने वैसा किया और ऐसा सुन कर देव इंद्र को क्रोध आया और उन्होंने लगातार तीन दिनों तक भयानक बारिश के साथ एक बड़ा तूफान लाया। इस आपदा को देखते हुए, लोग भगवान कृष्ण के पास गए,और  जनजीवन के बचाव के लिए भगवान कृष्ण ने  गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और इस दृश्य को देख भगवान इंद्र को अपनी गलती को महसूस हुआ और भगवान कृष्ण को नतमस्तक हो कर  छमायापन की जिस कारन से यह पोंगल पर भी प्रारम्भ हुआ  

दक्षिण भारत का सबसे बड़ा उत्सव

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