नवरात्रि का चौथा दिन - माँ कूष्माण्डा देवी पूजा

नवरात्रि का चौथा दिन देवी कूष्मांडा की पूजा के लिए समर्पित है - नवदुर्गा का चौथा रूप। यहां पूरे ब्रह्मांड को एक लौकिक अंडे के रूप में दर्शाया गया है और माना जाता है कि देवी अपनी दिव्य मुस्कान के साथ अंधेरे को समाप्त करती हैं। देवी कूष्मांडा के आठ हाथ हैं और इसी वजह से उन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। 2019 में, नवरात्रि का चौथा दिन बुधवार, 02 अक्टूबर को पड़ता है।

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देवी माँ कूष्माण्डा का स्वरूप तथा पूजन का महत्व

‘‘सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।।

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नवदुर्गा का चौथा अवतार अपनी मंद हंसी से ब्रह्माण्ड का निर्माण करने वाली "माँ कूष्मांडा" देवी दुर्गा का चौथा स्वरुप हैं। माँ कुष्मांडा की पूजा नवरात्रि के चौथे दिन की जाती है। इस दिन भक्त का मन 'अदाहत' चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन भक्त पवित्र-पावनी अचंचल मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर माँ देवी की पूजा,ध्यान और उपासना करते हैं|

जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था| तब कुष्मांडा देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। अतः ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। वहाँ निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल माँ देवी  कूष्माण्डा में है। इनके शरीर की कान्ति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान है।

इनके तेज और प्रकाश से दशों दिशाएँ प्रकाशित है। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है। माँ की आठ भुजाएँ हैं। अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है।

कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। माँ कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है।

विधि-विधान से माँ के भक्ति-मार्ग पर कुछ ही कदम आगे बढ़ने पर भक्त साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। यह दुःख स्वरूप संसार भक्त के  लिए सुखद और सुगम बन जाता है। माँ की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और सरल मार्ग है। इस दिन जहाँ तक संभव हो बड़े माथे वाली तेजस्वी विवाहित महिला का पूजन करना चाहिए। उन्हें भोजन में दही, हलवा खिला कर  इसके बाद फल, सूखे मेवे और सौभाग्य स्त्री को श्रींगार का सामान प्रेम पूर्वक भेंट करना चाहिए। जिससे माताजी प्रसन्न होती हैं। और मनवांछित फल अपने भक्तों को देती है।

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