रोहिणी व्रत पौराणिक कथा

भारतीय धर्म ग्रंथों के अनुसार रोहणी व्रत को एक मुख्य स्थान दिया गया है। रोहिणी व्रत जैन समुदाय से जुड़े व्रत पर्वों में से एक प्रसिद्ध पर्व  है, जो एक साधारण व्रत होने के बाद भी एक प्रसिद्ध त्यौहार माना जाता है।  यह व्रत रोहिणी देवी से जुड़ा है और इस दिन पूरे विधी विधान से उनकी पूजा की जाती है। यह व्रत वर्ष में कम से कम छह  से सात बार आता है,और कई बार महीने में एक या दो बार भी हो जाते है। इस व्रत में भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती है। देवी रोहणी को भी 27 नक्षत्रों में भी स्थान दिया गया है और जिस दिन यह नक्षत्र पड़ता है उस दिन अत्ति शुभ भी माना जाता है कहा जाता है की यदि कोई भी व्यक्ति इस दिन कुछ नया कार्य प्रारम्भ करता है तो उस जातक का कार्य समय पूर्वक पूर्ण होता है। रोहणी व्रत रखने वाला व्यलक्ति सदैव हर भौतिक सुखों से पूर्ण रहता है और जीवन में धन- धान्य से प्रशन्न रहता है   

रोहिणी व्रत से जुड़ी एक अद्भुद इतिहासिक कथा:

हस्तिनापुर नगर में वस्तुपाल नाम का राजा था और उसका धनमित्र नाम का मित्र था। उस धनमित्र के घर एक कन्या उत्पन्न हुई। उसके अन्दर से दुर्गंध आती थी। धनमित्र को अपनी पुत्री की हमेशा चिंता रहती थी।

इसी समय अमृतसेन मुनिराज नगर विहार के लिए आए, तो धनमित्र अपनी को पुत्री दुर्गंधा के साथ मुनिराज के दर्शन करने गया और मुनिराज से अपनी चिंता दर्शाते हुए पुत्री के भविष्य के बारे में पूछा। उन्होंने बताया, कि राजा भूपाल गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राज्य करते थे। उनकी सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा रानी के साथ वन में भ्रमण करने के लिए गए, तभी वहां राजा ने मुनीराज को देखा और रानी को घर जाकर मुनीराज के लिए भोजन व्यव्सथा करने को कहा। राजा की आज्ञा का पालन करने रानी गई तो मगर क्रोध में अकर रानी ने मुनिराज को कडुवी तुम्बीका भोजन में दे दिया, जिससे मुनिराज को काफि वेदना का सामना करना पड़ा और उसके कारण उन्होने अपने प्राण त्याग दिए। जब राजा को इन सब के बारे में पता चला तो राजा ने रानी को नगर से निकाल दिया। इस पाप के कारण रानी के पूरे शरीर में कोढ़ उत्पन्न हो गया। काफी कष्ट और दुख झेलने के बाद उसे मृत्यृ प्राप्त हुई और वह नर्क में गई। वहाँ अनन्त दुख भोगने के बाद वह पशु योनि में जन्मी और फिर तेरे घर दुर्गंधा कन्या हुई।

यह पूरी बात सुनने के बाद धनमित्र ने पूछा - इस पातक को दूर करने के लिए कोई व्रत विधानादि धर्मकार्य बताइये, तब मुनिराज ने कहा - सम्यग्दर्शन सहित रोहिणी व्रत का पालन करो, यानी की प्रत्येक माह के रोहिणी नक्षत्र वाले दिन व्रत कर रोहिणी देवी का पूजन करो। उस दिन आहार का त्याग कर धर्म और पूजा के कार्य में समय बिताए और दान-पून्य का कार्य करें। इस प्रकार यह व्रत 5 वर्ष और 5 मास तक करें।

दुर्गंधा ने श्राद्धापूर्वक व्रत धारण किया और अंत में मृत्यृ के बाद स्वर्ग में देवी हुई। रोहिणी व्रत उद्यापन रोहिणी व्रत निश्चित समय के लिए किया जाता है, इसका निर्णय स्त्री स्वयं लेती है। मानी गई अवधि पूरी होने पर इसका उद्यापन कर दिया जाता है। इस व्रत के लिए 5वर्ष 5 माह का समय श्रेष्ठ होता है। उद्यापन प्रक्रिया समाप्त होने के बाद गरीबों को खाना खिलाया जाता है और वासुपूज्य की पुजा की जाती है। उद्यापन के लिये इनके दर्शन किये जाते है। इस प्रकार पुराणों में रोहिणी व्रत को महत्वपूर्ण माना गया है।

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