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शनि प्रदोष व्रत 2022 तिथियां, व्रत कथा और विधि

शनि प्रदोष व्रत
प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि को प्रदोष काल के दौरान मनाया जाता है। यदि प्रदोष व्रत शनिवार को पड़ता है, तो इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है।
अन्य नामशनि प्रदोषम
तिथित्रयोदशी
दिनशनिवार
देवताभगवान शिव
तिथियाँ15 जनवरी 2022
22 अक्टूबर 2022
05 नवंबर 2022
विधिपूजा, उपवास, जागरण, दान, और प्रार्थना
लाभशनि दोष से राहत और नवजात शिशु को आशीर्वाद।

यदि प्रदोष व्रत शनिवार को पड़ता है तो इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है। इसे शनि प्रदोषम भी कहा जाता है। यह बहुत फलदायी है और इस व्रत रखने से शनिदेव की असीम कृपा होती है। शनि प्रदोष व्रत शनि के अशुभ प्रभाव से बचाव के लिए उत्तम होता है। शनि प्रदोष व्रत की कथा इस प्रकार है।

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शनि प्रदोष व्रत कथा


स्कंद पुराण के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था। उसकी माता की मृत्यु भी अकाल हुई थी। ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया।

कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई। वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भदेश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया।

एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त "अंशुमती" नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगे। गंधर्व कन्या और राजकुमार एक दूसरे पर मोहित हो गए, कन्या ने विवाह करने के लिए राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने के लिए बुलाया। दूसरे दिन जब वह दुबारा गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता ने बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है। भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कराया।

इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुनः आधिपत्य प्राप्त किया। यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का फल था। स्कंदपुराण के अनुसार जो भक्त प्रदोषव्रत के दिन शिवपूजा के बाद एक्राग होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती।

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लाभ: शनि प्रदोष व्रत से शनि दोष से राहत मिलती है और नवजात शिशुओं का आशीर्वाद भी मिलता है।

अन्य प्रदोष व्रत

रवि प्रदोष व्रत (भानु प्रदोषम)
सोम प्रदोष व्रत (सोम प्रदोषम)
मंगल प्रदोष व्रत (भौम प्रदोषम)
बुद्ध प्रदोष व्रत (सौम्य वारा प्रदोषम)
गुरु प्रदोष व्रत (गुरु वारा प्रदोषम)
शुक्र प्रदोष व्रत (भृगु वारा प्रदोषम)

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