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तारा जयंती महत्व, समारोह और पूजा

पुरे देश में महातारा जयंती को बहुत ही उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. तारा जयंती को चैत्र माह की नवमी तिथि तथा शुक्ल पक्ष के दिन मनाया जाता है. विशेष रूप से तंत्र मन्त्र की साधना करने वाले लोगों के लिए तारा जयंती के दिन माँ तारा की उपासना सर्वसिद्धिकारक मानी जाती है. माँ तारा को दस महाविद्याओं में से एक माना जाता हैं. शास्त्रों में देवी तारा को सूर्यप्रलय की अघिष्ठात्री देवी का उग्ररुप बताया गया है|

तारा जयंती तिथि

देवी तारा जयंती को चैत्र माह में शुक्ल पक्ष के नौवें दिन व्यापक रूप से जाना जाता है। वर्ष 2021 में, तारा जयंती बुधवार, 21 अप्रैल को पड़ती है।

कैसे मनाएं तारा जयंती 

गांधी जयंती के मौके पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित कई गणमान्य व्यक्ति नई दिल्ली स्थित राजघाट जाकर गांधी प्रतिमा के सामने श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इस दिन राष्ट्रीय अवकाश होता है। बापू की समाधि पर राष्ट्रपति और भारत के प्रधानमंत्री की उपस्थिति में प्रार्थना आयोजित की जाती है। भारत के हर कोने के साथ-साथ दुनिया के कई हिस्सों में भी महात्मा गांधी की जयंती मनाई जाती है। इस अवसर पर जगह-जगह रैली, पोस्टर प्रतियोगिता, स्पीच, डिबेट, नाटक समेत कई तरह के आयोजन किए जाते हैं।

मां तारा की पूजा विधि 

1.मां तारा की पूजा रात के समय में ही की जाती है। इसलिए आप मां तारा की पूजा अर्धरात्रि में ही करें। 

2. आपको मां तारा की पूजा अकेले कमरे में ही करनी चाहिए जहां पर आपके अलावा और कोई न हो। पूजा से पहले आप स्नान करके एक सफेद धोती पहने। आपको मां तारा की पूजा में सिले हुए वस्त्र नहीं धारण करने चाहिए। 

3. इसके बाद आपको पश्चिम दिशा में मुहं करके बैठ जाना चाहिए और अपने सामने एक चौकी रखनी चाहिए और उस पर गंगाजल डालकर उसे शुद्ध कर लेना चाहिए। 

4. चौकी को शुद्ध करने के बाद उस पर गुलाबी रंग का कपड़ा बिछाएं और अपने सामने एक प्लेट में गुलाब के फूल रखें। 

5. इसके बाद उस पर तारा यंत्र स्थापित करें और यंत्र के चारो और चावल की चार ढेरियां स्थापित करें।

6. चावल की ढेरी लगाने के बाद उस पर एक- एक लौंग रखें। इसके बाद यंत्र के सामने घी का दीपक जलाएं।

7. घी का दीपक जलाने के बाद मां तारा के मंत्रों का जाप करें। मंत्र जाप करने के बाद मां तारा की कथा सुने।

8. इसके बाद आपको मां तारा की आरती उतारनी चाहिए।

9. मां तारा की आरती करने के बाद तारा यंत्र को अपनी तिजोरी या पैसे रखने वाले स्थान पर रख देना चाहिए।

10. इसके बाद सभी पूजन सामग्री को किसी बहते जल या पीपल के पेड़ के पास जमीन में गहरा गड्डा खोदकर गाढ़ देना चाहिए।

मां तारा की कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार देवी तारा का जन्म मेरु पर्वत के पश्चिम भाग में चोलना नदी के किनारे पर हुआ थास्वतंत्र तंत्र के अनुसार, देवी तारा की उत्पत्ति , तट पर हुई। हयग्रीव नाम के दैत्य के वध हेतु देवी महा-काली ने ही, नील वर्ण धारण किया था। महाकाल संहिता के अनुसार, चैत्र शुक्ल अष्टमी तिथि में 'देवी तारा' प्रकट हुई थीं, इस कारण यह तिथि तारा-अष्टमी कहलाती हैं, चैत्र शुक्ल नवमी की रात्रि तारा-रात्रि कहलाती हैं। सबसे पहले स्वर्ग-लोक के रत्नद्वीप में वैदिक कल्पोक्त तथ्यों तथा वाक्यों को देवी काली के मुख से सुनकर, शिव जी अपनी पत्नी पर बहुत प्रसन्न हुए। शिवजी ने मां पार्वती को बताया की आदि काल में भयंकर रावण का विनाश किया तब आपका वह स्वरूप तारा नाम से विख्यात हुआ।

तारा जयंती का महत्व

चैत्र माह की नवमी तिथि और शुक्ल पक्ष के दिन माँ तारा की पूजा करने का नियम है. देवी तारा मनुष्य के जीवन में आने वाली सभी मुश्किलों, संकटों और परेशानियों से छुटकारा दिलाती हैं. मां तारा की साधना को पूर्ण रूप से अघोरी साधना माना जाता है. अगर कोई मनुष्य तारा जयंती के दिन माँ तारा की साधना करता है तो उसे लौकिक सुख के साथ साथ सुख शांति और समृद्धि भी प्राप्त होती है. जो भी व्यक्ति सच्चे मन से तारा जयंती के दिन माँ तारा की साधना करता है माँ तारा उसकी सभी मनोकामनाओं को पूरा करती हैं. इसके अलावा तारा जयंती के दिन माँ तारा की पूजा करने से धन से जुडी समस्याओं का भी अंत हो जाता हैं. माँ तारा को मुक्ति प्रदान करने वाली देवी भी माना जाता हैं. बताया जाता है कि इस त्योहार को बड़े ही धुम धाम से मनाया जाता है। 

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