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उत्पन्ना एकादशी तिथि, पूजा विधि और कथा

कृष्ण पक्ष के दौरान मार्गशीर्ष महीने में ग्यारहवें दिन को उत्पन्ना एकादशी को उत्पत्ति एकादशी भी कहा जाता है। यह पहली एकादशी है जो कार्तिक पूर्णिमा के बाद आती है। यह दिन भगवान विष्णु की शक्तियों में से एक देवी एकादशी के सम्मान में मनाया जाता है। जो की भगवान विष्णु का हिस्सा थी और राक्षस मुर को मारने के लिए उनसे पैदा हुई थी। जब उसने शयन के समय भगवान विष्णु पर हमला करने और मारने की कोशिश की थी। इस दिन को माँ एकादशी की उत्पत्ति और मूर के विनाश के रूप में याद किया जाता है।

बताया जाता है कि उत्तरी भारत के कई हिस्सों में उत्पान्ना एकादशी 'मार्गशीर्ष' के महीने में मनाई जाती है। यह त्यौहार कार्तिक महीने में महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और आंध्र प्रदेश राज्यों में मनाया जाता है।

हिंदू मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि उत्पन्न एकादशी तिथि पर उपवास को रखने से भक्तों के सभी अतीत और वर्तमान के सारे पाप धुल जाते हैं। इस साल उत्पन्ना एकादशी मंगलवार, 30 नवम्बर 2021 को पड़ रही है। 

उत्पन्ना एकादशी व्रत विधि

- इस एकादशी के लिए सबसे पहले धूप, दीप, नैवेद्य आदि ले।  

- सोलह सामग्री से पूजा करें और रात के समय दीपदान करना चाहिए।

- इस दिन सारी रात जगकर भगवान का भजन- कीर्तन करना चाहिए। 

- साथ ही श्री हरि विष्णु से अनजाने में हुई भूल या पाप के लिए क्षमा भी मांगनी चाहिए। 

- उत्पन्ना एकादशी के दूसरे दिन सुबह स्नान कर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा कर ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए।

- पद्म पुराण के अनुसार माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु सहित देवी एकादशी की पूजा का विधान है। 

- इसके अनुसार मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की दशमी को भोजन के बाद अच्छी तरह से दातून करना चाहिए ताकि अन्न का एक भी अंश मुंह में न रह जाए। 

- इसके बाद दूसरे दिन यानी कि उत्पन्ना एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर व्रत का संकल्प करके स्नान करना चाहिए। 

- इसके बाद भगवान श्री कृष्ण की पूजा विधि-विधान से करनी चाहिए।

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

भगवान श्री कृष्ण ने खुद युधिष्ठिर को एकादशी माता के जन्म और व्रत की कथा सुनाई। कृष्ण ने बताया की सतयुग के समय में एक मुर नामक एक बलशाली राक्षस रहता था। उसने अपने पराक्रम से स्वर्ग को जीत लिया। इसके बाद उसके पराक्रम के आगे इंद देव, वायु देव और अग्नि देव भी नहीं टिक पाए थे इसलिए उन सभी को जीवन यापन के लिए मृत्युलोक जाना पड़ा। निराश होकर देवराज इंद्र कैलाश पर्वत पर गए और भगवान शिव के समक्ष अपना दु:ख बताया। इंद्र की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव उन्हें भगवान विष्णु के पास जाने के लिए कहते हैं। इसके बाद सभी देवगण क्षीरसागर पहुंचते हैं, वहां सभी देवता भगवान विष्णु से राक्षस मुर से अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं। भगवान विष्णु सभी देवताओं को आश्वासन देते हैं। इसके बाद सभी देवता राक्षस मुर से युद्ध करने उसकी नगरी जाते हैं। कई सालों तक भगवान विष्णु और राक्षस मुर में युद्ध चलता है। युद्ध के समय भगवान विष्णु को नींद आने लगती है और वो विश्राम करने के लिए एक गुफा में सो जाते हैं। भगवान विष्णु को सोता देख राक्षस मुर उन पर आक्रमण कर देता है। लेकिन इसी दौरान भगवान विष्णु के शरीर से कन्या उत्पन्न होती है। इसके बाद मुर और उस कन्या में युद्ध चलता है। इस युद्ध में मुर घायल होकर बेहोश हो जाता है और देवी एकादशी उसका सिर धड़ से अलग कर देती हैं। इसके बाद भगवान विष्णु की नींद खुलने पर उन्हें पता चलता है कि किस तरह से उस कन्या ने भगवान विष्णु की रक्षा की है। इसपर भगवान विष्णु उसे वरदान देते हैं कि तुम्हारी पूजा करने वाले के सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी।

उत्पन्ना एकादशी का महत्व

ऐसा माना जाता है कि देवी एकादशी श्री हरि का एक शक्ति रूप हैं, इसलिए इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने उत्पन्न होकर राक्षस मुर का वध किया था। इसलिए इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि इस व्रत को रखने से मनुष्यों के पिछले जन्म के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। साथ ही यह व्रत संतान की प्राप्ति और मोक्ष के लिए किया जाने वाला व्रत है।

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