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वासुदेव द्वादशी 2021: तिथि, पूजा विधि और महत्व

वासुदेव द्वादशी हर साल आषाढ़ महीने में और चतुर मास की शुरुआत में मनाई जाने वाली वासुदेव द्वादशी इस साल 13 जुलाई को पड़ रही है. ये तिथि हमेशा देवशयनी एकादशी के एक दिन बाद पड़ती है. वासुदेव द्वादशी भगवान कृष्ण को समर्पित होती है. इस दिन भगवान कृष्ण के साथ-साथ भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है. मान्यता है कि आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और अश्विनी मास में जो ये खास पूजा करता है उन्हें मोक्ष मिलता है.

वासुदेव द्वादशी के दिन व्रत रखने का खास महत्व है. मान्यता है कि जो भी इस दिन व्रत रखता है उसके सारे पाप खत्म हो जाते हैं और संतान की प्राप्ति होती हैं. इस व्रत को करने से नष्ट हुआ राज्य भी वापस मिल जाता है. बताया जाता है कि यही नारद ने भगवान वासुदेव और माता देवकी को बताया था.

वासुदेव द्वादशी 2021 तिथि

इस साल वासुदेव द्वादशी चतुर मास की शुरुआत में मनाई जानी है। इस साल वासुदेव द्वादशी 13 जुलाई को जाएगी. ये तिथि हमेशा देवशयनी एकादशी के एक दिन बाद होती है. इस दिन भगवान कृष्ण के साथ-साथ भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है.

वासुदेव द्वादशी पूजा विधि

वासुदेव द्वादशी के दिन सुबह उठकर सबसे पहले नहा ले और नहाने के बाद साफ कपड़े पहनकर भगवान कृष्ण और देवी लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए. इस दिन भगवान को हाथ का पंखा और फल-फूल चढ़ानें चाहिए. इसके बाद भगवान विष्णु की पंचामृतच से पूजा कर उन्हें भोग लगा लें. और माना जाता है कि इस भगवान विष्णु के सहस्त्रनामों का जाप करने से सारे कष्ट दूर हो जाते है. इस दिन भगवान वासुदेव की स्वर्णिम प्रतिमा का दान करना भी बहुत शुभ माना जाता है. बताया जाता है कि इस दिन वासुदेव की स्वर्णिम प्रतिमा को जलपात्र में रखकर और दो कपड़ों से ढककर पूजा करें. इसके बाद उसका दान करें. 

वासुदेव द्वादशी महत्व

धार्मिक ग्रंथों में लिखा है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जबकि समस्त पाप कट जाते हैं। इस दिन भगवान कृष्ण के अनुयायी व्रत उपासना करते हैं। मंदिर और मठों में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। आज से जया पार्वती व्रत भी शुरू हो रहा है। अत: इस दिन का विशेष महत्व है। 

वासुदेव द्वादशी कथा

कहा जाता है कि बहुत समय पहले चुनार नाम का एक देश था. इस देश के राजा का नाम पौंड्रक था. पौंड्रक के पिता का नाम वासुदेव था इसलिए पौंड्रक खुद को वासुदेव कहा करता था. पौंड्रक पांचाल नरेश की राजकुमारी द्रौपदी के स्वयंवर में भी मौजूद था. पौंड्रक मूर्ख अज्ञानी था. पौंड्रक को उसके मूर्ख और चापलूस मित्रों ने कहा कि भगवान कृष्ण विष्णु के अवतार नहीं बल्कि पौंड्रक भगवान विष्णु का अवतार है. अपने मूर्ख दोस्तों की बातों में आकर राजा पौंड्रक नकली चक्र, शंख तलवार और पीत वस्त्र धारण करके अपने आप को कृष्ण समझने लगा. 

एक दिन राजा पौंड्रक ने भगवान कृष्ण को यह संदेश भी भेजा की उसने धरती के लोगों का उद्धार करने के लिए अवतार धारण किया है. इसलिए तुम इन सभी चिन्हों को छोड़ दो नहीं तो मेरे साथ ही युद्ध करो. काफी समय तक भगवान कृष्ण ने मूर्ख राजा की बात पर ध्यान नहीं दिया, पर जब राजा पौंड्रक की बातें हद से बाहर हो गई तब उन्होंने उत्तर भिजवाया कि मैं तेरा पूर्ण विनाश करके तेरे घमंड का बहुत जल्द नाश करूंगा. भगवान श्री कृष्ण की बात सुनने के बाद राजा पौंड्रक श्री कृष्ण के साथ युद्ध की तैयारी करने लगा. अपने मित्र काशीराज की मदद पाने के लिए काशीनगर गया. 

भगवान कृष्ण ने पूरे सैन्य बल के साथ काशी देश पर हमला किया. भगवान कृष्ण के आक्रमण करने पर राजा पौंड्रक और काशीराज अपनी अपनी सेना लेकर नगर की सीमा पर युद्ध करने आ गए. युद्ध के समय राजा पौंड्रक ने शंख, चक्र, गदा, धनुष, रेशमी पितांबर आदि धारण किया था और गरुड़ पर विराजमान था. उसने बहुत ही नाटकीय तरीके से उसने युद्ध भूमि में प्रवेश किया. राजा पौंड्रक के इस अवतार को देखकर भगवान कृष्ण को बहुत ही हंसी आई. इसके बाद भगवान कृष्ण ने पौंड्रक का वध किया और वापस द्वारिका लौट गए. युद्ध के पश्चात बदले की भावना से पौंड्रक के पुत्र ने भगवान कृष्ण का वध करने के लिए मारण पुरश्चरण यज्ञ किया, पर भगवन कृष्ण को मारने के लिए द्वारिका की तरफ गई वह आग की लपट लौटकर काशी आ गई और सुदर्शन की मृत्यु की वजह बनी. उसने काशी नरेश के पुत्र सुदर्शन का ही भस्म कर दिया. 

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