!-- Facebook Pixel Code -->

योगिनी एकादशी 2021: तिथि, व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व

योगिनी एकादशी निर्जला एकादशी के बाद और देवशयनी एकादशी से पहले आती है। योगिनी एकादशी आषाढ़ मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

योगिनी एकादशी 2021 तिथि

हिन्दू पौराणिक शास्त्रों में एकादशी तिथि को ‘हरि का दिन’ और ‘हरि वासर’ के नाम से भी जाना जाता है। हरि यानी जगत के पालनहार भगवान विष्णु का दिन। बता दें कि इस साल योगिनी एकादशी 5 जुलाई 2021 मनाई जाएगी। 

योगिनी एकादशी पूजा विधि

योगिनी एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर घर की साफ-सफाई करें. इसके बाद नित्यकर्म और स्नान करें और सूर्य को जल अर्पित करें. पूजा स्थान को गंगा जल से शुद्ध करें और भगवान विष्णु की प्रिय चीजों से श्रृंगार करें. इसके बाद भगवान विष्णु को पीले वस्त्र, पीले पुष्प और मिष्ठान अर्पित करें और धूप जलाकर व्रत आरंभ करें. भगवान विष्णु की पीला रंग अति प्रिय है. इसलिए उन्हें पीले रंग का प्रसाद ही चढ़ाएं. एकादशी के दिन चावल के सेवन से परहेज करें.

योगिनी एकादशी व्रत के लाभ

योगिनी एकादशी का व्रत करने से सारे पाप मिट जाते हैं और जीवन में समृद्धि और आनन्द की प्राप्ति होती है। योगिनी एकादशी का व्रत करने से स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। योगिनी एकादशी तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। यह माना जाता है कि योगिनी एकादशी का व्रत करना अठ्यासी हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है।

योगिनी एकादशी महत्व

हिंदू धर्म में योगिनी एकादशी का खास महत्व होता है। इस दिन श्री हरि विष्णु की पूजा की जाती है, साथ ही पीपल के पेड़ की पूजा का भी विधान है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने से व्रतियों के सभी पाप धुल जाते हैं और वो इस लोक के सभी सुख को भोगकर स्वर्ग की प्राप्ति करता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हेम नाम का एक माली था जिसे श्राप की वजह से कुष्ठ रोग हो गया था। एक ऋषि ने उससे Yogini Ekadashi का व्रत रखने की सलाह दी। व्रत के प्रभाव से उस माली का कुष्ठ रोग ठीक हो गया और तभी से ये दिन इतना महत्वपूर्ण बन गया।

योगिनी एकादशी कथा

स्वर्ग की अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नाम का एक राजा रहता था. वह शिव भक्त था इसलिए प्रतिदिन शिव पूजा किया करता था. हेम नाम का एक माली शिव पूजन के लिए उसके यहाँ फूल लाया करता था. हेम की विशालाक्षी नाम की सुंदर पत्नी थी. एक दिन वह मानसरोवर से फूल लेकर तो आया लेकिन कामासक्त होने के कारण वह अपनी स्त्री से हास्य-विनोद और रमण करने लगा. इधर राजा उसकी दोपहर तक फूल के लिए राह देखता रहा. अंत में राजा कुबेर ने सेवकों को आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर माली के न आने की वजह पता करो, क्योंकि वह अभी तक पूजा के फूल लेकर नहीं आया. सेवकों ने कहा कि महाराज वह पापी और अतिकामी है, अपनी पत्नी के साथ हास्य-विनोद और रमण कर रहा होगा. यह सुनकर कुबेर ने क्रोधित होकर उसको बुलाया. हेम माली राजा के भय से काँपता हुआ उनके समक्ष उपस्थित हुआ. राजा कुबेर ने क्रोध में आकर कहा- ‘अरे पापी! नीच! कामी! तूने मेरे परम पूजनीय देवादिदेव महादेव का अनादर किया है, इस‍लिए मैं तुझे अभी शाप देता हूँ कि तू पत्नी वियोग सहेगा और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी बनेगा.’ कुबेर के शाप से हेम माली का स्वर्ग से पतन हो गया और वह उसी पल पृथ्वी पर गिर गया. धरती पर आते ही उसके शरीर में श्वेत कोढ़ हो गया. उसकी पत्नी भी उसी वक्त अंतर्ध्यान हो गई. मृत्युलोक में आकर माली ने महान दु:ख भोगे, भयानक वन में जाकर बिना अन्न और जल के भटकता रहा.

अपनी टिप्पणी दर्ज करें



More Mantra × -
00:00 00:00