केशांत संस्कार अर्थ है केश यानी बालों का अंत करना, उन्हें समाप्त करना। विद्या अध्ययन से पूर्व भी केशांत किया जाता है। मान्यता है गर्भ से बाहर आने के बाद बालक के सिर पर माता-पिता के दिए बाल ही रहते हैं। इन्हें काटने से शुद्धि होती है। शिक्षा प्राप्ति के पहले शुद्धि जरूरी है, ताकि मस्तिष्क ठीक दिशा में काम करें। पुराने में गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद केशांत संस्कार किया जाता था।

महत्व -

जैसा कि नाम से ज्ञात होता है केशांत का तात्पर्य है केश यानि बालों का अंत लेकिन इससे यह भ्रम होना स्वाभाविक है कि यदि यह केशांत संस्कार में मुंडन ही किया जाता है तो फिर चूड़ाकर्म संस्कार यानि मुंडन संस्कार भिन्न कैसे है? तो इसमें अंतर यह है कि मुंडन संस्कार जातक के जन्म के समय से जो केश उसके सिर पर होते हैं उन्हें पहली बार उतरवाने का संस्कार है जबकि केशांत संस्कार में किशोरावस्था के दौरान जब जातक की दाड़ी आती है तो पहली बार उन केशों को उतारा जाता है यानि जातक की दाड़ी बनवाई जाती है इस दौरान भी जातक के सिर के बाल भी पुन: उतारे जाते हैं। दरअसल गुरु शिष्य परंपरा के दौरान जो कि उपनयन संस्कार के पश्चात आरंभ होती है। जातक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरु के सानिध्य में रहते हुए ज्ञानार्जन करता है। गुरु से शिक्षा दीक्षा प्राप्त करने के दौरान जातक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अपने केश भी नहीं कटवाता है। जब जातक युवावस्था की दहलीज़ पर आता है तो उसके श्मश्रु यानि दाड़ी भी उग आती है। इन्हीं केशों का जब विधि-विधान से अंत होता है तो इसे केशांत संस्कार कहा जाता है। इसी संस्कार के दौरान जातक द्वारा उपनयन संस्कार के दौरान धारण की गई मौजी मेखला आदि का भी परित्याग किया जाता है।

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