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निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना। जन्म के चौथे महीने में यह संस्कार किया जाता है। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिन्हें पंचभूत कहा जाता है, से बना है। इसलिए पिता इन देवताओं से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। साथ ही कामना करते हैं कि शिशु दीर्घायु रहे और स्वस्थ रहे।

निष्क्रमण संस्कार का महत्व-

बच्चे को पहली बार जब घर से बाहर निकाला जाता है। उस समय निष्क्रमण-संस्कार किया जाता है।

इस संस्कार का फल विद्धानों ने शिशु के स्वास्थ्य और आयु की वृद्धि करना बताया है-

निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युद्दिष्टा मनीषिभिः

जन्मे के चौथे मास में निष्क्रमण-संस्कार होता है। जब बच्चे का ज्ञान और कर्मेंन्द्रियों सशक्त होकर धूप, वायु आदि को सहने योग्य बन जाती है। सूर्य तथा चंद्रादि देवताओ का पूजन करके बच्चे को सूर्य, चंद्र आदि के दर्शन कराना इस संस्कार की मुख्य प्रक्रिया है। चूंकि बच्चे का शरीर पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकश से बनता है, इसलिए बच्चे के कल्याण की कामना करते है।

निष्क्रमण संस्कार की कुछ गतविधियां:-

शिशु के दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करने की कामना के लिये जन्म के तीन माह पश्चात् चौथे माह में किया जाने वाला निष्क्रमण संस्कार।

1- धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जन्म के चौथे महीने में निष्क्रमण संस्कार का विधान माना जाता है।

2- निष्क्रमण संस्कार के द्वारा ईश्वर से यह आशीर्वाद मांगा जाता है कि संतान तेजस्वी होने के साथ ही विनम्र हो।

3- निष्क्रमण संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाई जाती है  कि भगवान् सूर्य के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना निष्क्रमण संस्कार उद्देश्य है।

4- निष्क्रमण संस्कार उद्देश्य नवजात शिशु को तेजश्वी और विनम्रता प्रदान करना माना जाता है।

5- सूर्य से आशीर्वाद का उद्देश्य है कि शिशु को सूर्य देव के समान तेज प्राप्त हो और चन्द्रमा से कोमल हृदय और शीतलता प्राप्त हो।

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