यह संस्कार गर्भ में पल रहे बच्चे के चौथे, छठवें और आठवें महीने में किया जाता है। यह संस्कार सभी वर्ण जाती के लिए सामान होता है  इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म का ज्ञान आए, इसके लिए मां उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है और इसी संस्कार के दौरान गर्भ में पल रहे बालक के शरीर का विकास रक्त संचार होने लगता है।

संस्कार का महत्व-

येनादिते: सीमानं नयाति प्रजापतिर्महते सौभगाय।

तेनाहमस्यौ सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोमि।।

सीमन्तोन्नयन संस्कार सीमन्त और उन्नयन से मिलकर बना है। सीमन्त बालों को कहा जाता है और उन्नयन का अर्थ होता है ऊपर उठाना। मान्यता है कि जब स्त्री गर्भधारण करती है तो समय के साथ-साथ उसके अंदर बहुत सारे परिवर्तन आते हैं। सीमन्तोन्नयन संस्कार आठवें महीने में किया जाता है। इस समय स्त्री की पीड़ा और उसके स्वभाव में परिवर्तन बहुत बढ़ जाते हैं ऐसे में उसे मानसिक रूप से तैयार करने की जरूरत होती है। इस संस्कार के बहाने पति पत्नी के केश संवारता है ताकि उसे मानसिक शक्ति प्राप्त हो। इस संस्कार की यह मान्यता भी काफी प्रबल है कि इससे गर्भ सुरक्षित रहता है। माना जाता है कि चौथे, छठे या आठवें माह में गर्भपात हो जाये तो गर्भ के जीवित रहने की संभावनाएं नहीं होती बल्कि माता के जीवन को भी कई बार संकट हो जाता है। इसलिये यह संस्कार छठे या आठवें माह में अवश्य करने की सलाह दी जाती है। इस संस्कार का एक महत्व यह भी माना जाता है कि इससे शिशु का भी मानसिक विकास होता है। क्योंकि आठवें माह में वह माता को सुनने समझने लगता है। इसलिये मां का मानसिक स्वास्थ्य यदि बेहतर होगा तो शिशु का भी बेहतर बना रहता है।


सीमन्तोन्नयन संस्कार की पूजन रिति:-

सीमन्तोन्नयन संस्कार को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं।

1- सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है। सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा के लिए सीमन्तोन्नयन संस्कार किया जाता है।

2- सीमन्तोन्नयन संस्कार के माध्यम से गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं और गर्भस्थ शिशु के सम्पूर्ण विकास के साथ- साथ तेजस्वी पुत्र की कामनाएं करती है।

 


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