उप यानी पास और नयन यानी ले जाना। गुरु के पास ले जाने का अर्थ है उपनयन संस्कार। आज भी यह परंपरा है। जनेऊ यानि यज्ञोपवित में तीन सूत्र होते हैं। ये तीन देवता - ब्रह्मा, विष्णु,महेश के प्रतीक हैं। इस संस्कार से शिशु को बल,ऊर्जा और तेज प्राप्त होता है।

महत्व-

ऋग्वेद से पता चलता है कि गृह्यसूत्रों में वर्णित उपनयन संस्कार के कुछ लक्षण उस समय भी विदित थे। वहाँ एक युवक के समान यूप (बलि-स्तम्भ) की प्रशंसा की गयी है "यहाँ युवक रहा है, वह भली भाँति सज्जित है (युवक मेखला द्वारा तथा यूप रशन द्वारा); वह, जब उत्पन्न हुआ, महत्ता प्राप्त करता है; हे चतुर ऋषियों, आप अपने हृदयों में देवों के प्रति श्रद्धा रखते हैं और स्वस्थ विचार वाले हैं, इसे ऊपर उठाइए।" यहाँ "उन्नयन्ति" में वही धातु है, जो उपनयन में है। बहुत-से गृह्मसूत्रों ने इस मन्त्र को उद्धृत किया है, यथा- आश्वलायन, पारस्कर। तैत्तिरीय संहिता में तीन ऋणों के वर्णन में 'ब्रह्मचारी' एवं 'ब्रह्मचर्य' शब्द आये हैं- 'ब्राह्मण जब जन्म लेता है तो तीन वर्गों के व्यक्तियों का ऋणी होता है; ब्रह्मचर्य में ऋषियों के प्रति (ऋणी होता है), यज्ञ में देवों के प्रति तथा सन्तति में पितरों के प्रति; जिसको पुत्र होता है, जो यज्ञ करता है और जो ब्रह्मचारी रूप में गुरु के पास रहता है, वह अनृणी हो जाता है।उपनयन एवं ब्रह्मचर्य के लक्षणों पर प्रकाश वेदों एवं ब्राह्मण साहित्य में उपलब्ध हो जाता है। अथर्ववेद का एक पूरा सूक्त ब्रह्मचारी (वैदिक छात्र) एवं ब्रह्मचर्य के विषय में अतिशयोक्ति की प्रशंसा से पूर्ण है।

पिछला विषय

{ विवाह

अगला टॉपिक

गर्भाधान

अपनी टिप्पणी दर्ज करें


विज्ञापन

आगामी त्यौहार

रोहिणी व्रत

रोहिणी व्रत

भारतीय धर्म ग्रंथों के अनुसार रोहणी व्रत को एक मुख्य स्थान दिया गया है। रोहिणी व्रत जैन समुदाय से जु...

शीर्ष त्यौहार


More Mantra × -
00:00 00:00