सोलह संस्कार में जीवन का प्रथम संस्कार गर्भाधान-

निषेकाद् बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते।

क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम्।

गर्भाधान संस्कार ( Garbhaadhan Sanskar)  –  चारों वर्ण में बंटा हुआ यह ब्रह्माण्ड 16 संस्कारों से निर्मित है जिनमे से पहला संस्कार है गर्भाधानयह  संस्कार चारों वर्णों के लिए समान माना गया है यह एक ऐसा संस्कार है जिससे हमें योग्य, गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है। शास्त्रों में मनचाही संतान प्राप्त के लिए गर्भधारण संस्कार किया जाता है। इसी संस्कार से वंश वृद्धि होती है।

गर्भधारण और उसका महत्व -

(‘‘ऊँ पूषा भग सविता में ददातु रूद्रः कल्पतु ललामगुम। ऊँ विष्णुभौनिकल्पमतु त्वष्य रूपाणि यिथशतु साचिंसत्त प्रजापतिर्भानां गर्भ दधालुते।।’)

माता-पिता के रज एवं वीर्य के संयोग से संतानोत्पत्ति होती है। यह संयोग ही गर्भाधान कहलाता है। स्त्री और पुरुष के शारीरिक मिलन को गर्भाधान-संस्कार कहा जाता है। गर्भाधान जीव का प्रथम जन्म है, क्योंकि उस समय ही जीव सर्वप्रथम माता के गर्भ में प्रविष्ट होता है, जो पहले से ही पुरुष वीर्य में विद्यमान था। गर्भ में संभोग के पश्चात् वह नारी के रज से मिल कर उसके (नारी के) डिम्ब यानि गर्भ में प्रविष्ट होता है और विकास प्राप्त करता है। ऐसी स्थिति में उस गर्भवती  नारी यानि जन्मदाती को बलिष्ठ पुत्र प्राप्ति के लिए भगवन सूर्य को ध्यान अर्चन करना नितांत आवश्यक होता है।

गर्भस्थापन के बाद अनेक प्रकार के प्राकृतिक दोषों के आक्रमण होते हैं, जिनसे बचने के लिए यह संस्कार किया जाता है। जिससे गर्भ सुरक्षित रहता है। माता-पिता द्वारा खाये अन्न एवं विचारों का भी गर्भस्थ शिशु पर प्रभाव पडता है। माता-पिता के रज-वीर्य के दोषपूर्ण होने का कारण उनका मादक द्र्व्यों का सेवन तथा अशुद्ध खानपान होता है। उनकी दूषित मानसिकता भी वीर्यदोष या रजदोष उत्पन्न करती है। दूषित बीज का वृक्ष दूषित ही होगा। अतःर मंत्रशाक्ति से बालक की भावनाओं में परिवर्तन आता है, जिससे वह दिव्य गुणों से संपन्न बनता है। इसलिए गर्भाधान-संस्कार की आवश्यकता होती है।


गर्भाधान संस्कार की धार्मिक रीति:-

1- गर्भावस्था के प्रारंभिक कुछ दिनों तक जी घबराना, उल्टियां होना या थोड़ा रक्त चाप बढ़ जाना स्वाभाविक है। यहि गर्भाधान के लक्षण प्रारंभिक दिखने लग जाते हैं। 

2-  हिन्दू धर्म मान्यता के अनुसार स्त्री द्वारा गर्भस्थ धारण करने के बाद तीन माह बाद वर कन्या के दोनों पक्ष मिल कर वर के घर में एक आयोजन रखते हैं। जिस आयोजन में गर्भस्थ स्त्री की पूजा उसे आशीर्वाद दे कर नए वस्त्र सुयोग्य मिष्ठान दिया जाता है। जिसे गर्भ में पल रहे शिशु का प्रथम संस्कार माना जाता है और उसको नाम दिया गर्भाधान संस्कार।3- गर्भस्थापन के बाद अनेक प्रकार के प्राकृतिक दोषों के आक्रमण होते हैंजिनसे बचने के लिए यह गर्भधारण संस्कार किया जाता है।

4-  उसके बाद निरंतर कन्या अपना ध्यान माँ पार्वती की पूजा करना प्रारम्भ करती है


नोट:-

1- जैसे ही पुष्टि हो जाती है कि स्त्री गर्भवती हैं उसके बाद से प्रसव होने तक आप किसी स्त्री रोग विशेषज्ञ की निगरानी में रहें तथा नियमित रूप से अपनी चिकित्सीय जाँच कराती है।

2- गर्भधारण के समय रक्त वर्ग (ब्ल्ड ग्रुप), विशेषकर की जांच करनी चाहिए। इस के अलावा रूधिरवर्णिका (हीमोग्लोबिन) की भी जांच करनी चाहिए।

  


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