arkadaşlık sitesi porno adana escort izmir escort porn esenyurt escort ankara escort bahçeşehir escort जानिए हिन्दुओं के 16 संस्कार जन्म से मृत्यु तक - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र शूद्र जातकर्म संस्कार अनुष्ठान और नियम - हिंदू शुद्र जातकर्म अनुष्ठान और समारोह !-- Facebook Pixel Code -->

इस भू भाग में बालक जन्म लेते ही भौतिक जीवन से जुड़ने लग जाता बालक का जन्म होते ही जातकर्म संस्कार को किया जाता है। इस संस्कार को करने से शिशु के कई प्रकार के दोष दूर होते हैं। इसके अंतर्गत शिशु को शहद और घी चटाया जाता है साथ ही वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है ताकि बच्चा स्वस्थ और दीर्घायु हो।

संस्कार का महत्व-

जब जातक का जन्म होता है तो जातकर्म संस्कार किया जाता है इस बारे में कहा भी गया है कि जाते जातक्रिया भवेत् गर्भस्थ बालक के जन्म के समय जो भी कर्म किये जाते हैं उन्हें जातकर्म कहा जाता है। इनमें बच्चे को स्नान कराना, मुख आदि साफ करना, मधु घी चटाना, स्तनपान, आयुप्यकरण आदि कर्म किये जाते हैं। क्योंकि जातक के जन्म लेते ही घर में सूतक माना जाता है इस कारण इन कर्मों को संस्कार का रूप दिया जाता है। मान्यता है कि इस संस्कार से माता के गर्भ में रस पान संबंधी दोष, सुवर्ण वातदोष, मूत्र दोष, रक्त दोष आदि दूर हो जाते हैं जातक मेधावी बलशाली बनता है।

जातकर्म संस्कार के प्रमुख उपांग हैं-

मेधाजनन, प्रसूतिकाहोम, आयुष्यकरण, अंसाभिमर्षण, पंचब्राह्मणस्थापन, मात्र्यभिमंत्रण, स्तनप्रतिधान प्रतिरक्षात्मक अनुष्ठान। इनका विवरण निम्न रुपों में पाया जाता है।

इस संस्कार में पिता समाज को बालक के जन्म की सूचना देता है और कहता है कि-हे बालक मैं तुझ को ईश्वर का बनाया हुआ घृत और शहद चटाता हूँ, जिससे कि तू विद्वानों द्वारा सुरक्षित होकर इस लोक में सौ वर्ष तक धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करें। बालक का जन्म होने के बाद यह संस्कार किया जाता था। होम करने के बाद पिता बालक का स्पर्श करता था और उसे सूँघता था। इसके बाद वह बालक के कान में आशीर्वाद के मंत्र पढ़ता था, जिससे कि बालक दीर्घायु हो और प्रखरबुद्धि वाला हो। बालक को शहद और घी चटाया जाता था। इस घी में सोना भी घिसा जाता था। माता उसे अपने स्तनों से पहली बार दूध पिलाती थी। इसके बाद बालक की नाल काटी जाती थी। आयुर्वेद के अनुसार शहद से पित्त और घी से कफ का शमन होता है और घी और सोने से बुद्धि प्रखर होती है। इस संस्कार का प्रमुख उद्देश्य बालक को स्वस्थ और प्रखरबुद्धि वाला बनाना था।


जातकर्म संस्कार करने के मुख्य श्रोत:

जातकर्म संस्कार जब जातक इस भू मायावी जन-जीवन में जन्म लेता है तो उसके बाद उस समझ शिशु के सुभाग्य के लिए सभी परिजनों के साथ मिल कर जात कर्म संस्कार किया जाता है।    

1- नवजात शिशु के नालच्छेदन से पूर्व जातकर्म संस्कार को करने का विधान है।

2- इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ चटाया जाता है।

3- विशेष मन्त्रों एवं विधि से दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता यज्ञ करता है तथा नौ मन्त्रों का विशेष रूप से उच्चारण के बाद बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।

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