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शिशु यानि बच्चे के जन्म के बाद 11वें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। इस दिन घर में आकर ब्राह्मण द्वारा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बच्चे का नाम तय किया जाता है। उसी दिन से बच्चे को नाम से पुकारा जाता है। उस नवजात व्यक्ति के जीवन की पहली पहचान उसका नाम बन जाता है।

कब किया जाता है नामकरण संस्कार-

नामकरण संस्कार आम तौर पर जन्म के दस दिन बाद किया जाता है। दरअसल जातक के जन्म से सूतक प्रारंभ माना जाता है जिसकी अवधि वर्ण व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग होती है। पाराशर स्मृति के अनुसार ब्राह्मण वर्ण में सूतक दस दिन, क्षत्रियों में 12 दिन, वैश्य में 15 दिन तो शूद्र के लिये एक मास का माना गया है। वर्तमान में वर्ण व्यवस्था के अप्रासंगिक होने के कारण इसे सामान्यत: ग्यारहवें दिन किया जाता है। पारस्कर गृहयसूत्र कहता है दशम्यामुत्थाप्य पिता नाम करोति यानि दसवें दिन भी पिता द्वारा नामकरण किया जाता है। लेकिन इसके लिये यज्ञ का आयोजन कर सूतिका का शुद्धिकरण करवाया जाता है। नामकरण संस्कार 100वें दिन या एक वर्ष बीत जाने के पश्चात भी किया जाता है। गोभिल गृहयसूत्रकार लिखते भी हैं

 “जननादृशरात्रे व्युष्टे शतरात्रे संवत्सरे वा नामधेयकरणम्


नामकरण संस्कार का महत्व-

नामकरण शिशु जन्म के बाद दूसरा संस्कार कहा जा सकता है। यों तो जन्म के तुरन्त बाद ही जातकर्म संस्कार का विधान है, किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में वह व्यवहार में नहीं दीखता। अपनी पद्धति में उसके तत्त्व को भी नामकरण के साथ समाहित कर लिया गया है। इस संस्कार के माध्यम से शिशु रूप में अवतरित जीवात्मा को कल्याणकारी यज्ञीय वातावरण का लाभ पहुँचाने का सत्प्रयास किया जाता है। जीव के पूर्व संचित संस्कारों में जो हीन हों, उनसे मुक्त कराना, जो श्रेष्ठ हों, उनका आभार मानना-अभीष्ट होता है। नामकरण संस्कार के समय शिशु के अन्दर मौलिक कल्याणकारी प्रवृत्तियों, आकांक्षाओं के स्थापन, जागरण के सूत्रों पर विचार करते हुए उनके अनुरूप वातावरण बनाना चाहिए। शिशु कन्या है या पुत्र, इसके भेदभाव को स्थान नहीं देना चाहिए। भारतीय संस्कृति में कहीं भी इस प्रकार का भेद नहीं है। शीलवती कन्या को दस पुत्रों के बराबर कहा गया है। 'दश पुत्र-समा कन्या यस्य शीलवती सुता।' इसके विपरीत पुत्र भी कुल धर्म को नष्ट करने वाला हो सकता है। 'जिमि कपूत के ऊपजे कुल सद्धर्म नसाहिं।' इसलिए पुत्र या कन्या जो भी हो, उसके भीतर के अवांछनीय संस्कारों का निवारण करके श्रेष्ठतम की दिशा में प्रवाह पैदा करने की दृष्टि से नामकरण संस्कार कराया जाना चाहिए। यह संस्कार कराते समय शिशु के अभिभावकों और उपस्थित व्यक्तियों के मन में शिशु को जन्म देने के अतिरिक्त उन्हें श्रेष्ठ व्यक्तित्व सम्पन्न बनाने के महत्त्व का बोध होता है।


यज्ञ पूजन द्वारा नामकरण संस्कार कुछ विशेष विधियाँ 

1- यदि 11वें या 21वें दिन जनमित शिशु का नामकरण किया जा रहा हो  तो वहाँ सयम पर स्वच्छता का कार्य पूरा कर लिया जाना चाहिए।

2- शिशु एवं माता को सही मुहूर्त में नामकरण संस्कार के लिए तैयार किया जाना चाहिए

3- संस्कार के समय जहाँ माता शिशु को लेकर बैठे, वहीं वेदी के पास थोड़ा सा स्थान स्वच्छ करके, उस पर स्वस्तिक चिह्न बना दिया जाए। इसी स्थान पर बालक को भूमि स्पर्श कराया जाता है

4- मंगलाचरण, षट्कर्म, संकल्प, यज्ञोपवीत परिवर्तन, कलावा, तिलक एवं रक्षा-विधान तक का क्रम पूरा करके विशेष कर्मकाण्ड प्रारम्भ किया जाए।

5- नामकारण या शुद्धि के लिए हवन में विशेष आहुति के लिए खीर, मिष्टान्न या मेवा जिसे हवन सामग्री में मिलाकर आहुतियाँ दी जाती है

6- प्राचीन सभ्यता के अनुसार शिशु के नामकरण में ब्राह्मण द्वारा नाम की घोषणा के बाद थाली पर निर्धारित नाम सुन्दर ढंग से लिखा जाता है। चन्दन रोली से लिखकर, उस पर चावल तथा फूल की पंखुड़ियाँ सुशोभित कर के उनमें रंग मिलाकर, उन्हें अक्षरों के आकार में सुनयोजित कर रंग-बिरंगी खड़िया के रंगों से नाम लिखे जाते थे। और ब्राह्मण द्वारा कहे जाने पर शिशु का शंख ध्वनि के साथ नाम को उधबोधित किया जाता है।


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टिप्पणियाँ

  • 24/01/2021

    Good morning sir, I like know my name's first letter or name and my date of birth is november 10 1993 in 7:87 am in jammu kashmir srinagar india. Please tell me my name.

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