arkadaşlık sitesi porno adana escort izmir escort porn esenyurt escort ankara escort bahçeşehir escort जानिए हिन्दुओं के 16 संस्कार जन्म से मृत्यु तक - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र शूद्र पुंसवन संस्कार अनुष्ठान और नियम - हिंदू शुद्र पुंसवन अनुष्ठान और समारोह !-- Facebook Pixel Code -->

गर्भाधान की तरह यह पुंसवन संस्कार भी चारों वर्णों के लिए सामान होता है गर्भस्थ शिशु के बौद्धिक और मानसिक विकास के लिए यह संस्कार किया जाता है। पुंसवन संस्कार के प्रमुख लाभ ये है कि इससे स्वस्थ, सुंदर गुणवान संतान की प्राप्ति होती है।

पुंसवन संस्कार गर्भ का विकास सम्यक प्रकार से हो, इसके लिये पुंसवन संस्कार, गर्भाधान संस्कार के तीसरे महीने में किया जाता है। इस संस्कार की मुख्य क्रिया में खीर की पांच आहुतियां दी जाती हैं। हवन से बची हुई खीर को एक पात्र में भरकर पति, पत्नी की गोद में रखता है और एक नारियल भी प्रदान करता है। पूजा समाप्ति और ब्राह्मण भोजन के पश्चात् पत्नी इस खीर का प्रेम पूर्वक सेवन करती है।

पुंसवन संस्कार का महत्व

सुपर्णोऽसि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो, गायत्रं चक्षुबरृहद्रथन्तरे पक्षौ।

स्तोमऽआत्मा छन्दा स्यंगानि यजूषि नाम।

साम ते तनूर्वामदेव्यं, यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः।

सुपर्णोऽसि गरुत्मान् दिवं गच्छ स्वःपत॥

गर्भ सुनिश्चित हो जाने पर तीन माह पूरे हो जाने तक पुंसवन संस्कार कर देना चाहिए। विलम्ब से भी किया तो दोष नहीं, किन्तु समय पर कर देने का लाभ विशेष होता है। तीसरे माह से गर्भ में आकार और संस्कार दोनों अपना स्वरूप पकड़ने लगते हैं। अस्तु, उनके लिए आध्यात्मिक उपचार समय पर ही कर दिया जाना चाहिए। गर्भ का महत्त्व समझें, वह विकासशील शिशु, माता-पिता, कुल परिवार तथा समाज के लिए विडम्बना बने, सौभाग्य और गौरव का कारण बने। गर्भस्थ शिशु के शारीरिक, बौद्धिक तथा भावनात्मक विकास के लिए क्या किया जाना चाहिए, इन बातों को समझा-समझाया जाए। गर्भिणी के लिए अनुकूल वातावरण खान-पान, आचार-विचार आदि का निर्धारण किया जाए। गर्भ के माध्यम से अवतरित होने वाले जीव के पहले वाले कुसंस्कारों के निवारण तथा सुसंस्कारों के विकास के लिए, नये सुसंस्कारों की स्थापना के लिए अपने संकल्प, पुरुषार्थ एवं देव अनुग्रह के संयोग का प्रयास किया जाता है।


तीन माह उपरांत होता है गर्भस्थ शिशु का पुंसवन संस्कार:

यह संस्कार गर्भस्थ शिशु के समुचित विकास के लिए गर्भिणी का किया जाता है। कहना होगा कि बालक को संस्कारवान बनाने के लिए सर्वप्रथम जन्मदाता माता-पिता को सुसंस्कारी होना चाहिए। उन्हें बालकों के प्रजनन तक ही दक्ष नहीं रहना चाहिए, वरन सन्तान को सुयोग्य बनाने योग्य ज्ञान तथा अनुभव भी एकत्रित कर लेना चाहिए। जिस प्रकार रथ चलाने से पूर्व उसके कल-पुर्जों की आवश्यक जानकारी प्राप्त कर ली जाती है। उसी प्रकार माता - पिता को संतान प्राप्ति से पूर्व एक सुयोग्य संस्कार वान होना आवश्यक है।

1- गर्भ सुनिश्चित हो जाने पर तीन माह पूरे हो जाने पर पुंसवन संस्कार किया जाता है। क्योंकि तीसरे माह से गर्भ में प्राण मात्र पिंड आकार और संस्कार दोनों अपना स्वरूप पकड़ने लगते हैं।

2- गर्भिणी के लिए अनुकूल वातावरण खान-पान, आचार-विचार आदि का निर्धारण किया जाए। गर्भ के माध्यम से अवतरित होने वाले जीव के पहले वाले कुसंस्कारों के निवारण तथा सुसंस्कारों के विकास के लिए, नये सुसंस्कारों की स्थापना के लिए अपने संकल्प, पुरुषार्थ एवं देव अनुग्रह के संयोग का प्रयास किया जाता है।

 3- गर्भ का पूजन केवल एक सामयिकता औपचारिकता रह जाए इस लिए संस्कारित करने के लिए पूजा उपासना का सतत प्रयोग किया जाता है और घर में आस्तिकता का वातावरण रहे। और ब्राह्मण द्वारा दिए गए मन्त्र गर्भिणी को स्वयं भी नियमित उपासना करनी पड़ती है। या गायत्री चालीसा पाठ एवं पंचाक्षरी मन्त्र ' र्भूभुवः स्वः' का जप करना चाहिए

4- गर्भ पूजन में गर्भिणी के घर परिवार के सभी परिजन  ब्राह्मण द्वारा दिए गए हाथ में अक्षत, पुष्प दे कर मन्त्र पाठ कर और मंत्र समाप्ति के बाद सभी के हाथों से पुष्प एकत्रित करके गर्भिणी को दिया जाता है। वह उसे पेट से स्पर्श करके पूजन स्थान पर रख देती है। भावना द्वारा गर्भस्थ शिशु को सद्भाव और देव अनुग्रह का लाभ देने के लिए पूजन किया जा रहा है। गर्भिणी उसे स्वीकार करके गर्भ में पल रहे शिशु को सकुशल रहने संस्कारवान के लिए अपने से बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करती है।


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