विद्या आरंभ संस्कार के माध्यम से शिशु को उचित शिक्षा दी जाती है। शिशु को शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से परिचित कराया जाता है। और जीवन के भौतिक वस्तुओं से परिचित करा कर ज्ञान का मार्ग दिखाया जाता है। इस दिन से बच्चा स्कूल जाना प्रारम्भ करता है। 

जब बालक/ बालिका की आयु शिक्षा ग्रहण करने योग्य हो जाय, तब उसका विद्यारंभ संस्कार कराया जाता है। इसमें समारोह के माध्यम से जहाँ एक ओर बालक में अध्ययन का उत्साह पैदा किया जाता है, वही अभिभावकों, शिक्षकों को भी उनके इस पवित्र और महान दायित्व के प्रति जागरूक कराया जाता है कि बालक को अक्षर ज्ञान, विषयों के ज्ञान के साथ श्रेष्ठ जीवन के सूत्रों का भी बोध और अभ्यास कराते रहें।

विद्यारम्भ संस्कार के लिए धार्मिक परम्परा-

पूजन के लिए गणेशजी एवं माँ सरस्वती के चित्र या प्रतिमाएँ।

पट्टी, दवात और लेखनी, पूजन के लिए। बच्चे को लिखने में सुविधा हो, इसके लिए स्लेट, खड़िया भी रखी जा सकती है।

गुरु पूजन के लिए प्रतीक रूप में नारियल रखा जा सकता है। बालक के शिक्षक प्रत्यक्ष में हों, तो उनका पूजन भी कराया जा सकता है।


विद्यारम्भ संस्कार पूजा विधि:

भारतीय हिन्दू धर्म से जुड़े चार वर्ण समुदाय के लोग अपने अपने कर्म के अनुसार अपने सन्तान के प्रति उस शिक्षा को प्रदान कराना चाहते हैं जो उनके  धर्म और कर्म से जुड़ा रहता है हर माता पिता की तरह आपकी भी चाहत होगी कि आपके बच्चे खूब पढ़े लिखें और योग्य बनें लेकिन ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कुण्डली में अगर विद्या योग नहीं हो तो पढ़ने लिखने में बच्चे की रूचि कम होती है इस लिए बचे के जन्म होने के बाद उसे शिक्षा प्रदान करने के लिए विद्या आरंभ संस्कार किया जाता है मुहूर्त शास्त्र के अनुसार जो काम शुभ मुहूर्त में शुरू होता है उसका परिणाम भी शुभ होता है इस दृष्टि से बच्चों की शिक्षा आरंभ करने के लिए सबसे उत्तम तिथि माघ शुक्ल पंचमी तिथि को माना गया है वेद और पुराणों में कहा गया है कि सृष्टि के आरंभ में माघ शुक्ल पंचमी तिथि को ज्ञान की देवी सरस्वती प्रकट हुई थीं। इन्होंने अपनी वीणा से स्वर को जन्म दिया था।

विद्यारम्भ संस्कार पूजा विधि:

1- विद्या आरंभ संस्कार को किसी शुभ तिथि,वार,नक्षत्र, योग को देख कर शुभ मुहूर्त निकाल कर विद्या आरंभ संस्कार का प्रारम्भ किया जाता है और शिशु को अपने कर्म और धर्म के अनुसार शिक्षा एबी विद्या आरंभ की शिक्षा देते हैं इस दिन पूरा श्रेय जन्मदायनी  माँ को जाता है। 

2- विद्या आरंभ संस्कार के शुभ मुहूर्त पर  माता सरस्वती की पूजा की जाती है और ज्ञान एवं विद्या प्रदान करने की प्रार्थना की जाती है।

3- विद्या आरंभ के लिए प्राचीन काल में माता पिता अपने बच्चों को बसंत पंचमी यानी माघ शुक्ल पंचमी को गुरू के पास ले जाते हैं या घर में ईश्वर स्वरुप उस शिशु को विद्या आरंभ के कुछ अक्षर को प्राप्त कराते हैं।

4-  माँ और गुरू बच्चों से सबसे पहले  शब्द लिखवाते थे माना जाता था कि जो बच्चा इस अक्षर को जितना सुन्दर लिखता है उस पर मां सरस्वती की उतनी कृपा दृष्टि है  शब्द लिखवाने का कारण यह माना जाता है कि ब्रह्माण्ड में सबसे पहले  शब्द गूंजा था।

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