प्रत्येक महीने में दो एकादशी होती हैं जो कि शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष के दौरान आती हैं। एकादशी के महत्व को स्कन्द पुराण एवं पदम् पुराण में भी बताया गया है। कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी रमा एकादशी के नाम से जानी जाती है  इस एकादशी को रम्भा एकादशी भी कहते है इस दिन भगवान् केशव को सम्पूर्ण वस्तुयों से पूजन , नैवेद्य तथा आरती कर प्रसाद वितरण का विधान है एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है यह व्रत एकादशी तिथि से पहले सूर्यास्त से लेकर एकादशी से अगले सूर्योदय तक रखा जाता है।  रमा एकादशी को ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाति है। रमा एकादशी, 2018 में 4 नवम्बर को मनाई जाएगी।




रमा एकादशी की कथा:

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में मुकुंद नामक एक धर्मात्मा और दानी राजा था। प्रजा उन्हें भगवान के तुल्य मानते थे। राजा मुकुंद वैष्णव सम्प्रदाय को मानता था। अतः राजा नियमित और श्रद्धा-पूर्वक भगवान विष्णु जी का पूजन किया करता था। राजा के अति भक्ति से प्रभावित होकर प्रजा भी एकादशी व्रत करने लगी। कुछ समय पश्चात राजा के घर एक पुत्री का जन्म हुआ। जो अत्यंत शील और गुणवान थी। राजा ने अपनी पुत्री का नाम चन्द्रभागा रखा। समय के साथ चन्द्रभागा बड़ी हो गई। तत्पश्चात राजा ने चन्द्रभागा का विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन से कर दी।चन्द्रभागा अपने पति के साथ ससुराल में रहने लगी। विवाह के पश्चात प्रथम एकादशी को चन्द्रभागा अपने पति को भी एकादशी व्रत करने को कहती है। शोभन की अति हठ के परिणाम स्वरूप शोभन भी एकादशी व्रत व् उपवास करता है। किन्तु एकादशी तिथि के मध्य काल में शोभन को भूख लग जाती है। शोभन भूख से व्याकुल हो तड़पने लगता है कुछ समय में शोभन की मृत्यु हो जाती है। मृत्यु उपरांत शोभन मंदराचल पर्वत पर स्थित देवनगरी राज का राजा बनता है। देवनगरी में राजा शोभन की सेवा हेतु अनेक अप्सराएं उपस्थित रहती है। चन्द्रभागा अपने पति की मृत्यु के उपरांत भी एकादशी व्रत को श्रद्धा-पूर्वक करती है। एक दिन राजा मुकुंद अपने सैनिको के साथ देवनगरी भ्रमण को जाते है। देवनगरी में शोभन को देखकर राजा मुकुंद अति प्रसन्न होते है।

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