कोकिला व्रत से मिलता है मनचाहा जीवनसाथी जानिए व्रत कथा

धर्म ग्रन्थ व  पुराणों के अनुसार आषाढ़ माह की पूर्णिमा को कोकिला व्रत रखने का विधान है इस दिन  सौभाग्य स्त्रियां व कुवांरियाँ कन्यायें अपने अच्छे पति की प्राप्ति के लिए इस व्रत का  नियम पूर्वक विधि विधान से पालन कर व्रत रखती है हिन्दू धर्म में कोकिला अधिकमास का विशेष महत्व है। कोकिला व्रत को विशेष कर कुमारी कन्या सुयोग्य पति की कामना के लिए करती है। इस व्रत  की विधि विधान से पूजन अर्चन करने वाले जातकों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इस दिन जातक को ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर अपने नित्य दैनिक कार्य से निवृत होकर स्नान करना चाहिए  व उसके बाद भगवान शिव व पार्वती जी की प्रतिमा को स्थापित कर उनकी पूजा अर्चन कर उस दिन उनके  भजन-कीर्तन करने चाहिए शिव और शक्ति  की पूजा जल, पुष्प, बेलपत्र, दूर्वा, धुप,दीप आदि से करें। इस दिन निराहार व्रत करना चाहिए। सूर्यास्त के पश्चात आरती-अर्चना कर फलाहार करना चाहिए। इस व्रत को कुवांरियाँ कन्याएँ के साथ-साथ विवाहित नारियाँ भी करती है।

कोकिला व्रत कथा – 

शिव पुराण के अनुसार इस व्रत का प्रारम्भ माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए किया था।  शिव पुराण के अनुसार माता पार्वती के जन्म से पूर्व माँ पार्वती कोयल बनकर दस हजार वर्षों तक  वन में भटकती रही। शाप मुक्त होने के बाद पार्वती ने कोयल की पूजा की इससे भगवान शिव प्रसन्न हुए और माता पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इस व्रत का प्रारम्भ आषाढ़ पूर्णिमा से प्रारम्भ और श्रवण पूर्णिमा को समाप्त होती है। यह व्रत यह दर्शाता है की सजा सिर्फ मनुष्य को ही नहीं अपितु देवी देवताओं को मिलती है। पौराणिक कथानुसार एक बार राजा दक्ष की बेटी सती अपने पिता के अनुमति के खिलाफ भगवान शिव से विवाह कर लेती है। जिस कारण राजा दक्ष बेटी सती से नाराज हो जाते है। राजा दक्ष भगवान शिव जी के रहन-सहन से घृणा करते थे। जिस  कारण वह अपनी बेटी सती का विवाह शिव से नहीं करना चाहते थे परन्तु सती के हट के कारण सती ने  शिव से अपना विवाह संपन्न किया। जिस कारण राजा दक्ष ने अपनी कन्या सती से अपना सम्बन्ध तोड़ दिया।

कथा के अनुसार एक बार राजा  दक्ष ने अपने राज माहल में एक महा यज्ञ का आयोजन कराया था। जिस यज्ञ में राजा दक्ष से सभी देविओं को परिवार सहित आमंत्रित व ऋषि मुनियों को आमंत्रित किया था और अपने सभी पुत्रियों को बुलाया था परन्तु माता सती व देवाधि पति भगवान शिव को नहीं बुलाया था। न ही उस यज्ञ में उनका कहीं स्थान था। परन्तु पिता के द्वारा अयोजित यज्ञ का नाम सुनते ही माता सती के मन में उत्कंठा जगने लगी की मुझे भी यज्ञ में जाना है पति के न करने के बाद भी माता सती बिना बुलाये यज्ञ में पहुँच गयी परन्तु वहां जा कर माता सती को अपने पति यानि भगवान शिव का अपमान लगा तो माता सती क्रोध में उस महा यज्ञ कुंड में कूद गयी और उधर जब भगवान शिव को मालूम चला तो उन्होंने यज्ञ का विध्वंस करने के लिए वीरभद्र की उत्पत्ति कर वीरभद्र को यज्ञ का विध्वंस करने की आज्ञा दी। वीरभद्र ने यज्ञ का विध्वंस कर कई देवताओं का अंग-प्रत्यंग भंग कर दिया ऐसी स्थिति को देखते ही भगवान विष्णु शिव के पास गए व देवताओं को पूर्ववत बनाने का आग्रह किया। भगवान आशुतोष ने स्वीकार कर दिया परन्तु माता सती की आज्ञा का उलंघनता को क्षमा नहीं कर सके व माता सती को दश हजार वर्षों तक कोकिला पक्षी बनने का श्राप दे दिया। दश वर्ष पश्चात् माता सती ने पार्वती रूप में जन्म लेकर आषाढ़ माह में एक माह का व्रत रख कर पुनः भगवन शिव को पति रूप में प्राप्त किया।

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