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अजा एकादशी 2022: तिथि, व्रत कथा, विधी और महत्व

अजा एकादशी

कृष्ण पक्ष की भाद्रपद मास में कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक 2 दिन बाद अजा एकादशी पड़ती है। इसे कामिका एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस एकादशी पर भक्तों को भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और इसके प्रभाव से अज्ञानता में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। आइए जानते हैं इस एकादशी व्रत कथा, विधी और महत्व के बारे में।

तीथि और शुभ मुहूर्त

तिथि: भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष एकादशी
आजा एकादशी 2022 दिनांक: मंगलवार, 23 अगस्त
पारण का समय- बुधवार 24 अगस्त को प्रातः 05:55 से 08:30 बजे तक
पारण दिवस पर द्वादशी समाप्ति क्षण – 08:30 AM

एकादशी तिथि प्रारंभ – 03:35 AM मंगलवार, 22 अगस्त 2022
एकादशी तिथि समाप्त – 06:06 AM बुधवार, 23 अगस्त 2022

अवश्य पढ़ें: एकादशी 2022 तिथियां

अजा एकादशी व्रत कथा

अर्जुन ने कहा- “हे पुण्डरिकाक्ष! अब आप कृपा करके मुझे भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में भी बतलाइये। इस एकादशी का क्या नाम है तथा इसके व्रत का क्या विधान है? इसका व्रत करने से किस फल की प्राप्ति होती है?”

श्रीकृष्ण ने कहा- “हे कुन्ती पुत्र! भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा कहते हैं। इसका व्रत करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य इस दिन श्रद्धापूर्वक भगवान का पूजन करते हैं, उनके सभी प्राप नष्ट हो जाते हैं। इहलोक और परलोक में मदद करने वाली इस एकादशी व्रत के समान संसार में दूसरा कोई व्रत नहीं है।

अब ध्यानपूर्वक इस एकादशी का माहात्म्य श्रवण करो- पौराणिक काल में अयोध्या नगरी में एक चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। उसका नाम हरिश्चन्द्र था। वह अत्यन्त वीर, प्रतापी तथा सत्यवादी था। प्रभु इच्छा से उसने अपना राज्य स्वप्न में एक ऋषि को दान कर दिया और परिस्थितिवश उसे अपनी स्त्री और पुत्र को भी बेच देना पड़ा। स्वयं वह एक चाण्डाल का दास बन गया। उसने उस चाण्डाल के यहाँ कफन लेने का काम किया, किन्तु उसने इस आपत्ति के काम में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। जब इसी प्रकार उसे कई वर्ष बीत गये तो उसे अपने इस नीच कर्म पर बड़ा दुख हुआ और वह इससे मुक्त होने का उपाय खोजने लगा। वह सदैव इसी चिन्ता में रहने लगा कि मैं क्या करूँ? किस प्रकार इस नीच कर्म से मुक्ति पाऊँ? एक बार की बात है, वह इसी चिन्ता में बैठा था कि गौतम् ऋषि उसके पास पहुँचे। हरिश्चन्द्र ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी दुख-भरी कथा सुनाने लगा।

राजा हरिश्चन्द्र की दुख-भरी कहानी सुनकर महर्षि गौतम भी अत्यन्त दुखी हुए और उन्होंने राजा से कहा- ‘हे राजन! भादों के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अजा है। तुम उस एकादशी का विधानपूर्वक व्रत करो तथा रात्रि को जागरण करो। इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।

महर्षि गौतम इतना कह आलोप हो गये। अजा नाम की एकादशी आने पर राजा हरिश्चन्द्र ने महर्षि के कहे अनुसार विधानपूर्वक उपवास तथा रात्रि जागरण किया। इस व्रत के प्रभाव से राजा के सभी पाप नष्ट हो गये। उस समय स्वर्ग में नगाड़े बजने लगे तथा पुष्पों की वर्षा होने लगी। उसने अपने सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा देवेन्द्र आदि देवताओं को खड़ा पाया। उसने अपने मृतक पुत्र को जीवित तथा अपनी पत्नी को राजसी वस्त्र तथा आभूषणों से परिपूर्ण देखा।

व्रत के प्रभाव से राजा को पुनः अपने राज्य की प्राप्ति हुई। वास्तव में एक ऋषि ने राजा की परीक्षा लेने के लिए यह सब कौतुक किया था, परन्तु अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ऋषि द्वारा रची गई सारी माया समाप्त हो गई और अन्त समय में हरिश्चन्द्र अपने परिवार सहित स्वर्ग लोक को गया।

हे राजन! यह सब अजा एकादशी के व्रत का प्रभाव था। जो मनुष्य इस उपवास को विधानपूर्वक करते हैं तथा रात्रि-जागरण करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्त में वे स्वर्ग को प्राप्त करते हैं। इस एकादशी व्रत की कथा के श्रवण मात्र से ही अश्वमेध यज्ञ के फल की प्राप्ति हो जाती है।”

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अजा एकादशी व्रत विधी

  • आजा एकादशी के दिन भक्त अपने देवता भगवान विष्णु के सम्मान में व्रत रखते हैं। इस व्रत का पालन करने वाले को भी एक दिन पहले ही सात्विक भोजन करना चाहिए, ताकि दशमी को मन को सभी नकारात्मकताओं से मुक्त किया जा सके।
  • अजा एकादशी व्रत का पालन करने वाला दिन में सूर्योदय के समय उठता है और फिर मिट्टी और तिल से स्नान करता है। पूजा के लिए जगह को साफ करना चाहिए। एक शुभ स्थान पर, चावल रखा जाना चाहिए, जिसके ऊपर पवित्र ‘कलश’ रखा गया है। इस कलश के मुख को लाल कपड़े से ढका गया है और भगवान विष्णु की एक मूर्ति को रखा गया है। भक्त तब भगवान विष्णु की मूर्ति की पूजा फूल, फल और अन्य पूजा सामग्री से करते हैं। स्वामी के सामने एक घी का दीया भी जलाया जाता है।
  • अजा एकादशी व्रत का पालन करने पर, भक्तों को पूरे दिन कुछ भी खाने से बचना चाहिए, यहां तक कि पानी की एक बूंद भी अनुमति नहीं है। फिर भी हिंदू शास्त्रों में यह उल्लेख है कि यदि व्यक्ति अस्वस्थ है और बच्चों के लिए है, तो फल खाने के बाद व्रत मनाया जा सकता है। इस पवित्र दिन पर सभी प्रकार के अनाज और चावल से बचना चाहिए। शहद खाने की भी अनुमति नहीं है।
  • इस दिन भक्त ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ और ‘भगवद् गीता’ जैसी पवित्र पुस्तकों को पढ़ते हैं। प्रेक्षक को भी पूरी रात सतर्कता बरतनी चाहिए और सर्वोच्च स्वामी के बारे में पूजा और ध्यान करने में समय व्यतीत करना चाहिए। अजा एकादशी व्रत के पालनकर्ता को भी अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए ‘ब्रह्मचर्य’ के सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक है।
  • ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद अगले दिन (द्वादशी) को चर्बी तोड़ी जाती है। खाना फिर परिवार के सदस्यों के साथ ‘प्रसाद’ के रूप में खाया जाता है। ’द्वादशी’ पर बैंगन खाने से बचना चाहिए।

अजा एकादशी व्रत का महत्व

अजा एकादशी व्रत बहुत महत्वपूर्ण है; अगर यह उचित नियमों के साथ किया जाता है। जैसा कि यह सभी पापों और अधर्म को दूर करता है। आपको रत्रि जागरण के लिए पूरी रात जागकर रहना चाहिए। यह व्रत सभी अनजाने में हुए पापों को मिटाने में मदद करता है। और अपने परिवार में अपार सुख और समृद्धि मिलेगी।

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""ज्योतिष क्षेत्र में चल रहे 20 वर्षों के अनुभव के साथ""

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