अष्टमी कैलेंडर २०२०

हिंदू पंचांग की आठवीं तिथि को अष्टमी कहा जाता हैं। ये तिथि महिनें में दो बार आती है। पूर्णिमा के बाद और अमावस्या के बाद आती है। साथ ही पूर्णिमा के बाद आने वाली अष्टमी को कृष्ण पक्ष की अष्टमी और अमावस्या के बाद आने वाली अष्टमी को शुक्ल पक्ष की अष्टमी कहा जाता है। आइये अब देखना ये है कि अष्टमी कैलेंडर २०२० में कौन सी तिथि कब-कब आती है|

अष्टमी तिथियां २०२०

आइए जानते है इस साल के अष्टमी कैलेड़र २०२० की तिथियों के बारे में जो कुछ इस प्रकार है-

दिनांक पक्ष अष्टमी
शुक्रवार, ३ जनवरी पौष शुक्ल पक्ष मासिक दुर्गाष्टमी, बनदा अष्टमी
शुक्रवार, १७ जनवरी माघ कृष्ण पक्ष कालाष्टमी
रविवार, २ फरवरी माघ शुक्ल पक्ष मासिक दुर्गाष्टमी, भीष्म अष्टमी
रविवार, १६ फरवरी फाल्गुन कृष्ण पक्ष जानकी जयंती, कालाष्टमी
मंगलवार, ३ मार्च फाल्गुन शुक्ल पक्ष मासिक दुर्गाष्टमी, रोहिणी व्रत, होलाष्टक
सोमवार, १६ मार्च चैत्र कृष्ण पक्ष शीतला अष्टमी, कालाष्टमी
बुधवार, १ अप्रैल चैत्र शुक्ल पक्ष अप्रैल फूल, मासिक दुर्गाष्टमी, अशोक अष्टमी
बुधवार, १५ अप्रैल वैशाख कृष्ण पक्ष
शुक्रवार, १ मई वैशाख शुक्ल पक्ष अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस,बगलामुखी जयंती, मासिक दुर्गाष्टमी, महाराष्ट्र दिवस
शुक्रवार, १५ मई ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष
शनिवार, ३० मई ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष मासिक दुर्गाष्टमी, धूमावती जयंती
शनिवार, १३ जून आषाढ़ कृष्ण पक्ष कालाष्टमी
रविवार, २८ जून आषाढ़ शुक्ल पक्ष मासिक दुर्गाष्टमी
सोमवार, १३ जुलाई श्रवण कृष्ण पक्ष दूसरा श्रवण सोमवर व्रत
सोमवार, २७ जुलाई श्रवण शुक्ल पक्ष चौथी श्रवण सोमवर व्रत, तुलसीदास जयंती, मासिक दुर्गाष्टमी
बुधवार, १२ अगस्त भाद्रपद कृष्ण पक्ष
बुधवार, २६ अगस्त भाद्रपद शुक्ल पक्ष राधा अष्टमी, मासिक दुर्गाष्टमी
गुरुवार, १० सितंबर अश्विन कृष्ण पक्ष रोहिणी व्रत, महालक्ष्मी व्रत समाप्त, अष्टमी श्राद्ध, कालाष्टमी, जिवितपुत्रिका व्रत
गुरुवार, २४ सितंबर अधिक अश्विन शुक्ल पक्ष मासिक दुर्गाष्टमी
शनिवार, १० अक्टूबर अधिक अश्विन कृष्ण पक्ष
शनिवार, २४ अक्टूबर अश्विन शुक्ल पक्ष मासिक दुर्गाष्टमी, दुर्गाष्टमी , संधि पूजा, महा नवमी
सोमवार, ९ नवंबर कार्तिक कृष्ण पक्ष
रविवार, २२ नवंबर कार्तिक शुक्ल पक्ष मासिक दुर्गाष्टमी, गोपाष्टमी
मंगलवार, ८, दिसंबर मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष
मंगलवार, २२ दिसंबर मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष मासिक दुर्गाष्टमी

 

अष्टमी २०२० पर महत्वपूर्ण त्योहार; और उनकी पूजा विधि

बता दें कि हर महीने शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दौरान दुर्गाष्टमी का उपवास किया जाता है। इस दिन श्रद्धालु दुर्गा माता की पूजा करते हैं और उनके लिए पूरे दिन का व्रत करते हैं। मुख्य दुर्गाष्टमी जिसे महाष्टमी कहते हैं, अश्विन माह में नौ दिन के शारदीये नवरात्रि उत्सव के दौरान पड़ती है। दुर्गाष्टमी को दुर्गा अष्टमी के रूप में भी लिखा जाता है और मासिक दुर्गाष्टमी को मास दुर्गाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है| कालाष्टमी और राधाष्टमी भी अष्टमी के सबसे महत्वपूर्ण पर्व हैं।

मासिक दुर्गाष्टमी

दुर्गाष्टमी महीने मे एक बार आती है और इसलिए इसे मासिक दुर्गाष्टमी कहा जाता हैं. बताया जाता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजा करने का बहुत ही खास महत्व होता है. माना जाता है कि इस दिन सच्चे दिल और श्रद्धा से जो भी मांगते हो वो मनोकामना दुर्गा मां ज़रूर पूरा करती हैं.

दुर्गाष्टमी

दुर्गाष्टमी

चैत्र नवरात्री मे अष्टमी का सबसे ज्यादा महत्व होता है| कहना है कि इसी दिन काली, महाकाली, भद्रकाली, दक्षिणकाली तथा बिजासन माता माता की पूजा करी जाती है| असल मे इन देवी को कुल की देवी कहा जाता है| 

दुर्गाष्टमी की पूजा विधि

दुर्गाष्टमी वाले दिन पूरे विधि विधान से दुर्गाष्टमी पर व्रत रखने और पूजा करने से मनचाहा फल प्राप्त होता है. दुर्गाष्टमी वाले दिन सुबह उठकर जल्दी स्नान कर लेना चाहिए उसके बाद जहाँ आप पूजा करते हैं वहां पर गंगाजल डालकर उस जगह को शुद्ध कर लें| साथ ही लकड़ी के पाट पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर मां दुर्गा की प्रतिमा रखें| साथ ही धूप और दीपक को जलाकर दुर्गा चालीसा का पाठ पढ़ें और फिर मां की आरती करें उसके बाद हाथ जोड़कर प्रार्थना करें, दुर्गा मां आपकी सारी इच्छाओं को ज़रूर पूरा करेंगी|

कालाष्टमी

महीने की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी कहा जाता है. कृष्णपक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी या भैरवाष्टमी के रूप मनाया जाता है| आपको बता दें कि इस दिन लोग भगवान भैरव की भी पूजा भी करते हैं और व्रत भी रखते हैं. बताया जाता है कि इस व्रत में भगवान काल भैरव की उपासना कर दी जाती है| उनको शिव का पांचवा अवतार कहा जाता है. साथ ही इनके दो रूप होते है सबसे पहला बटुक भैरव, वहीं काल भैरव| बताया जाता है कि काल भैरव की पूजा करने से शनि और राहू जैसे ग्रह भी शांत हो जाते हैं. कालभैरव की पूजा करने से शत्रु बाधा और दुर्भाग्य दूर होता है और सौभाग्य जाग जाता है.

पूजा कैसे करनी चाहिए

आपको स्नान के बाद भगवान भैरव बाबा के मंदिर में जाकर अबीर, गुलाल, चावल, फूल और सिंदूर चढ़ाना जाता है| उसके बाद भगवान भैरव की प्राप्ति के लिए नीले फूल अवश्य चढ़ाना चाहिए| निश्चित रूप से आपकी मनोकामना पूरी होगी.

चढ़ाएं नींबू की माला

माना जाता है कि काले उड़द, काले तिल और 11 रुपए काले कपड़े में रखकर भगवान भैरव को चढ़ाने से शरीर की सारी नकारात्मकता दूर हो जाती है| कहा जाता हैं कि कालाष्टमी के दिन भगवान भैरव को नींबू की माला चढ़ाने से मनोवांछित फल प्राप्त होता है|

चमेली का तेल और सिंदूर करें अर्पित

कालाष्टमी पर इस तरह पूजा करने से भैरव बाबा भक्त को जीवन में अपार धन, यश और सफलता देते हैं. मान्यता है कि तमाम तरह के कष्टों से मुक्ति और कालभैरव भगवान की कृपा पाने के लिए कालाष्टमी के दिन किसी मंदिर में जाकर काजल और कपूर का दान करें. धन संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए कालाष्टमी के दिन भगवान भैरव के मंदिर में जाकर चमेली का तेल और सिंदूर अर्पित करें|

राधाष्टमी त्योहार

राधाष्टमी त्योहार

भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधाष्टमी के नाम से जाना जाता है| राधाष्टमी के दिन श्रद्धालु बरसाना की ऊँची पहाडी़ पर स्थित गहवर वन की परिक्रमा करी जाती है| कहा जाता है कि इस दिन बरसाना में बहुत ज्यादा रौनक होती है| अलग-अलग प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है| धार्मिक गीतों तथा कीर्तन के साथ इस उत्सव का आरम्भ किया जाता है|

राधाष्टमी पूजा

राधाष्टमी वाले दिन आपको साफ मन से व्रत का पालन करना चाहिए| साथ ही राधाजी की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराया जाता हैं स्नान कराने के बाद उनका श्रृंगार किया जाता है और राधा जी की सोने या किसी अन्य धातु से बनी हुई सुंदर मूर्ति को विग्रह में स्थापित किया जाता हैं. मध्यान्ह के समय श्रद्धा तथा भक्ति से राधाजी की आराधना होती है| साथ ही आरती करने के बाद अंत में भोग लगाया जाता है. कई ग्रंथों में राधाष्टमी के दिन राधा-कृष्ण की संयुक्त रुप से पूजा की बात करी गई है.

इसके अनुसार सबसे पहले राधाजी को पंचामृत से स्नान कराया जाता है और उनका विधिवत रुप से श्रृंगार भी होता है| इस दिन मंदिरों में 27 पेड़ों की पत्तियों और 27 ही कुंओं के जल को इकठ्ठा किया जाता है| आखिर में कई मन पंचामृत से वैदिक मम्त्रों के साथ “श्यामाश्याम” का अभिषेक होता है| कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को पूरे नियम से करता हैं वह सभी पापों से मुक्त हो जाता हैं.

राधाष्टमी महत्व

वेद तथा पुराणादि में राशाजी का कृष्ण वल्लभा कहकर गुणगान किया हुआ है| वही कृष्णप्रिया होती हैं. राधाजन्माष्टमी कथा का श्रवण करने से भक्त सुखी, धनी और सर्वगुणसंपन्न बन पाता है- भक्तिपूर्वक श्री राधाजी का मंत्र जाप के साथ-साथ स्मरण मोक्ष प्रदान करता है| श्रीमद देवी भागवत श्री राधा जी कि पूजा की अनिवार्यता का निरूपण करते हुए कहा है कि श्री राधा की पूजा न की जाए तो भक्त श्री कृष्ण की पूजा का अधिकार भी नहीं रखता| श्री राधा भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी मानी गई हैं| 

अष्टमी में अन्य त्योहार

अष्टमी में और भी अनेक त्योहार होते है जिनको अलग-अलग नामो से जाना जाता है और इन त्योहारों के नाम कुछ इस प्रकार है – बनदा अष्टमी, भीष्म अष्टमी, जानकी जयंती, शीतला अष्टमी, अशोक अष्टमी, बगलामुखी जयंती, धूमावती जयंती, तुलसीदास जयंती, गोपाष्टमी, अष्टमी का बहुत महत्व होता है आपको बता दें कि अष्टमी को पूरे नियम के साथ और सच्चे मन से किया जाए तभी आपकी सारी मनोकामना पूरी होंगी|

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here