बुद्ध अवतार – भगवान विष्णु का नौवां अवतार

धर्म ग्रंथों के अनुसार बौद्धधर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध भी भगवान विष्णु के ही अवतार थे परंतु पुराणों में वर्णित भगवान बुद्धदेव का जन्म गया के समीप कीकट में हुआ बताया गया है और उनके पिता का नाम अजन बताया गया है। यह प्रसंग पुराण वर्णित बुद्धावतार का ही है।

श्रीमद्भागवतम् सर्ग 900 ई। के अनुसार, कृष्ण विष्णु का रूप हैं जो अन्य अवतारों से बहुत अलग थे। श्रीमद्भागवतम् में उल्लिखित सूची में, जो कई को सबसे विश्वसनीय मानते हैं, दोनों बलराम, साथ ही बुद्ध, दिखाई देते हैं।
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बुद्ध अवतार से जुड़ी कथा

बुद्ध अवतार से जुड़ी कथा

एक समय दैत्यों की शक्ति बहुत बढ़ गई। देवता भी उनके भय से भागने लगे। राज्य की कामना से दैत्यों ने देवराज इन्द्र से पूछा कि हमारा साम्राज्य स्थिर रहे, इसका उपाय क्या है। तब इन्द्र ने शुद्ध भाव से बताया कि सुस्थिर शासन के लिए यज्ञ एवं वेदविहित आचरण आवश्यक है। तब दैत्य वैदिक आचरण एवं महायज्ञ करने लगे, जिससे उनकी शक्ति और बढऩे लगी। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने देवताओं के हित के लिए बुद्ध का रूप धारण किया। उनके हाथ में मार्जनी थी और वे मार्ग को बुहारते हुए चलते थे।

इस प्रकार भगवान बुद्ध दैत्यों के पास पहुंचे और उन्हें उपदेश दिया कि यज्ञ करना पाप है। यज्ञ से जीव हिंसा होती है। यज्ञ की अग्नि से कितने ही प्राणी भस्म हो जाते हैं। भगवान बुद्ध के उपदेश से दैत्य प्रभावित हुए। उन्होंने यज्ञ व वैदिक आचरण करना छोड़ दिया। इसके कारण उनकी शक्ति कम हो गई और देवताओं ने उन पर हमला कर अपना राज्य पुन: प्राप्त कर लिया।
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भगवान बुद्ध संसार को ज्ञान का मार्ग प्रदान किया और उनकी शिक्षाओं से बौद्ध धर्म की स्थापना और प्रचलन हुआ। गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु के दशावतारों के से नौवा अवतार कहा गया है। कई पौराधिक और हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में इसका वर्णन है। भगवान बुद्ध ने लोगो को अहिंसा के मार्ग में चलने का उपदेश दिया। उनके उपदेश में लोगो को दुःख और उसके कारण और निवारण के लिए अष्ठांगिक मार्ग सुझाया था। तथा उन्होंने लोगो को मध्यम मार्ग का उपदेश दिया था।

भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईशा पूर्व लुम्बनी, नेपाल में इक्षवाकु क्षत्रिय कुल में हुआ था। उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया था। उनके पिता सुद्धोधन और माता महामाया था। माता की मृत्यु के उपरांत महामाया की बहन ने किया था। उनकी पत्नी का नाम यशोधरा था तथा उनका एक पुत्र था जिनका नाम राहुल था। उनके गुरु विश्वामित्र थे।
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एक रात अचानक उन्होंने अपना परिवार और राजपाठ छोड़कर वन की तरफ दिव्य ज्ञान की खोज में चले गए। और कठिन परिश्रम और साधना से उनके बाद उन्हें बोधी वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हो गयी , वह स्थान विहार के बोध गया के नाम से विख्यात है। तब उनका नाम सिद्धार्थ से बुद्ध हो गया , गौतम गोत्र के कारण उनको गौतम बुद्ध कहा गया।

गौतम बुद्ध अवतार

भगवान बुद्ध जिनका नाम सिद्धार्थ था, उनका राज्य बहुत सम्पन्न और सभी तरह से खुशहाल था। उनके आनंद और विलाश का सारा प्रबंध उनके पिता और राजा सुद्धोधन ने किया था। परंतु उनको धन, वैभव और विलासिता रोक नही पाई। 

एक दिन जब वे सैर पर निकले तो उनको एक बूढ़ा आदमी मिला जिसकी अवस्था बहुत जर्जर थी। दूसरे दिन उनको उन्हें एक बहुत बूढा और रोगी व्यक्ति मिला जो बहुत से रोगों से ग्रसित था और बहुत दुखी था। तीसरे दिन दिन जब वे सैर पर निकले तो उन्हें एक मृतक को चार लोग ले जाते हुए दिखे साथ मे बहुत लोग थे जिनमें से कुछ लोग रो रहे थे।

तब उनके अंदर विरक्ति का भाव हुआ उनको लगा कि जवानी, और सरीर नाशवान है, फिर जब वे चौथे दिन सैर पर निकले तो उनके एक वैरागी व्यक्ति दिखा जो संसार से विरक्त था। तब वे भी संसारिक भावनाओं और इक्षाओ से मुक्त हो सन्यास के मार्ग में चल दिये।
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भगवान बुद्ध के ज्ञान की प्राप्ति

भगवान बुद्ध के ज्ञान की प्राप्ति

भगवान बुद्ध को बिहार के बोध गया में बोधि वृक्ष के नीचे हुआ, जिसका उपदेश उन्होंने अपने चार शिष्यों को दिया। उन्होंने शांति हेतु मध्यम मार्ग का उपदेश दिया जिसमें उन्होंने वीणा के तारों का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर वीणा के तारो को ढीला रखा जाए तो स्वर नही निकलते और अगर अधिक कड़े कर दिए जाय तो टूट जाते है अतः मध्यम मार्ग ही सबसे उत्तम है। उन्होंने ध्यान, चार आर्य सत्य, और साष्टांग मार्ग आदि का उपदेश दिया।
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बौद्ध धर्म का पतन

भारतीय तत्वमीमांसीय प्रणालियों के प्रतिबंधित ज्ञान के साथ, विदेशी इतिहासकारों ने आदि शंकराचार्य के जन्म से लेकर इसके जन्म तक बौद्ध धर्म के पतन का श्रेय दिया है। यह एक मिथक था और कांची कामकोटि गणित के 68 वें शंकराचार्य, श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती ने मिथक को तोड़ दिया है।
श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती के अनुसार, सांकरा हिंदू धर्म के सांख्य और मीमासत्ताग्रिडियों में गलतियों को सुधारने के बारे में अधिक चिंतित थे, जिन्होंने इस्वर के महत्व पर विश्वास करने से इनकार कर दिया था।

जहाँ भी श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती ने बौद्ध धर्म के साथ निपटा, उन्होंने केवल भगवान की उपस्थिति से इनकार किया। फिर भी धर्म बिगड़ गया, लेकिन क्यों? मीमांसाकस प्लस तारिकस (तर्कवादियों) ने नैतिक और धार्मिक सम्पदा पर बौद्ध धर्म का विरोध किया।
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गौतम बुद्ध का निधन

भगवान बुद्ध का निधन 483 ईसा पूर्व भारत के कुशीनगर में हुआ था। उनके शिष्यों की संख्या भी बहुत बड़ी थी, जिससे बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ। कई राजा महाराजा भी बौद्ध धर्म से जुड़े और प्रचारित किए जिनमें सम्राट अशोक का भी बड़ा योगदान था।
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