बुद्ध पूर्णिमा का महत्व – पूर्ण जागरण का काल

बुद्ध पूर्णिमा बौद्धों का पर्व है जिसे गौतम बुद्ध के जन्मदिवस के रूप में मनाते है. यह मुख्य रूप से भारत में मनाया जाता है और दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों जैसे- नेपाल. बुद्ध पूर्णिमा हर वर्ष हिन्दू माह वैशाख में पूर्ण चंद्रमा के होने पर मनाया जाता है. इस वर्ष यह पर्व 10 मई को पड़ेगा. यह दिन पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है क्योंकि बुद्ध का जन्म पूर्ण चंद्रमा की रात्रि को हुआ था. यह वेसक दिन के नाम से भी जाना जाता है.

गौतम बुद्ध हमेशा से ही बहुतों के लिए प्रेरणा रहे है. उनकी जीवन यात्रा रोचक थी और उस तक पहुंचना भी मुश्किल है.

छठे से चौथे शताब्दी ई.पू. के दौरान नेपाल में एक बालक ने जन्म लिया जिसका नाम सिद्धार्थ गौतम था. आरम्भ से ही, उसके बारे में यह भविष्यवाणी की गई थी की या तो वो एक महान राजा होगा या महान अध्यात्मिक प्रचारक. राजशाही परिवार में जन्म लेने के कारण, उनके पिता चाहते थे की वो राज्य का संचालन करें और इसी कारण उन्हें दुनिया के सभी दुःख और विपत्तियों से दूर रखा गया. एक सुन्दर दिन, वो एक नगर भ्रमण पर निकलें और विभिन्न प्रकार के लोगों और हालातों को देखा जिसने उन्हें जीवन के सही अर्थ के बारे में जाने के लिए जिज्ञासु बनाया. काफी कम उम्र में उन्होनें सबकुछ का  परित्याग कर स्वयं की खोज प्रारंभ की और इसी कारण महान गौतम बुद्ध के रूप में उन्हें जाना गया और उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया.

बुद्ध पूर्णिमा का महत्व

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  • यह वह दिन है जब भगवान् बुद्ध का जन्म ‘सिद्धार्थ गौतम’ के रूप में हुआ.
  • इस दिन वह सभी सुखों को त्याग कर स्वयं की खोज में निकलें.
  • इस दिन उन्होंने मोक्ष की प्राप्ति की और वो बनें जिसका “पूर्ण जागरण” हुआ.
  • ऐसा माना जाता है की बुद्ध पूर्णिमा में 10 हितकारी स्थितियों में से 9 के निर्माण हुआ जिन्हें महायोग के नाम से जानते है. अतः यह दिन ज्योतिषीय महत्त्व से भी काफी शुभ माना जाता है.

बुद्ध पूर्णिमा की रस्में

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  • बौद्ध अनुयायी इस दिन को वर्ष के सबसे महत्वपूर्ण घंटों के रूप में मनाते है. इस दिन वे सफ़ेद कपड़े पहनते है और मांसाहारी भोजन नही खाते है.
  • वे विहार के भ्रमण से आरंभ करते है और अपने बौधि सूत्र का पालन करते है.
  • लोग खीर बनाते है और दूसरों में बांटते है जैसे की एक औरत जिनका नाम सुजाता था , भगवान् बुद्ध को दूध के खीर का कटोरा खाने को दी थी.
  • हिन्दू परम्परा के अनुसार, दान करने के लिए वैशाख पूर्णिमा काफी महत्व रखता है और क्षिप्रा नदी में पवित्र डुबकी लगाने के लिए भी.
  • पंडित व्यास आदर्श रूप से कहते है की यह उत्सव मोहिनी एकादशी से बुद्ध पूर्णिमा तक मनाना चाहिए. इस महत्त्व के पीछे दंतकथा है की भगवान् विष्णु ने मोहिनी का रूप लिया और देवताओं को अमृत पिलाया.
  • बुद्ध पूर्णिमा पर लोग बोधि वृक्ष को सजाते है और मोक्ष प्राप्ति के लिए इसके जड़ में जल डालते है.
  • कुछ लोग पिंजरे से पक्षियों को आजाद करके शांति और मुक्ति का संदेश देते है.
  • बुद्ध पूर्णिमा पर पंच सिंधान्तो का पालन किया जाता है जिसे ‘पंचशील’ कहते है. वे इन सिन्धान्तों में दृढ विश्वास रखते है. ये निम्नलिखित है:जीवन ना लेना
    चोरी नहीं करना
    झूठ नहीं बोलना
    शराब नहीं पीना
    परस्त्रीगमन नहीं करना.

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