महापर्वों में सबसे अनोखा और अद्भुद पर्व है छठ पूजा

महापर्वों में सबसे अनोखा और अद्भुद पर्व है छठ पूजा

छठ पूजा 2018 इस बार 13 नवंबर को मनाया जाएगा। छठ व्रत कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। भविष्य पुराण के अनुसार भगवान सूर्यदेव को समर्पित एक विशेष पर्व है। भारत के कई हिस्सों में खासकर यूपी और बिहार में तो इसे महापर्व माना जाता है। शुद्धता, स्वच्छता और पवित्रता के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व आदिकाल से मनाया जाता है।

छठ व्रत में छठी माता की पूजा होती है और उनसे संतान की रक्षा का वर मांगा जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार सूर्य षष्ठी या छठ व्रत की शुरुआत रामायण काल से हुई थी। इस व्रत को सीता माता समेत द्वापर युग में द्रौपदी ने भी किया था।

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छठ पूजा कई अन्य नामों से भी जाना जाता है जैसे छठ, छठी माई के पूजा, छठ पर्व, छठ पूजा, डाला छठ, डाला पूजा, सूर्य षष्ठी व्रत आदि। छठ चार दिवसीय उत्सव है। जिसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होती है। छठ व्रत सबसे कठीन व्रतों में से एक माना जाता है, इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं और पानी भी ग्रहण नहीं करते।

प्रमुख रूप से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाने वाला यह पर आज के समयानुसार देश के कोने-कोने तक बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है। पश्चिमी यूपी में भी अब छठ का उत्सव देखने को मिलता है। कई जगहों पर तो बड़े ही उल्लास के साथ संगीत कार्यक्रम भी आयोजित किया जाता है , जिसमें भोजपुरी समाज से कई कलाकार आते हैं और अपनी प्रस्तुती देते हैं।


हिंदू धर्म में छठ पूजा एकमात्र ऐसा त्योहार है जिसमें सूर्य उदय के साथ साथ सूर्य अस्त की भी पूजा की जाती है। छठ पर्व की शुरूआत नहाय खाय से होती है। इसके बाद खरना होता है। खरना के अगले दिन दिन भर व्रत रहने के बाद शाम को संध्या अर्घ्य देने के लिए लोग घाट नदी, पोखरों पर जाते हैं। संध्या अर्घ्य के अगले दिन सुबह उषा अर्घ्य दिया जाता है।

छठ पूजा व्रत कथा –

कथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। परंतु दोनों की कोई संतान न थी। इस बात से राजा और उसकी पत्नी बहुत दुखी रहते थे। उन्होंने एक दिन संतान प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के फल स्वरूप रानी गर्भवती हो गई।


नौ महीने बाद संतान सुख को प्राप्त करने का समय आया तो रानी को मरा हुआ पुत्र प्राप्त हुआ। इस बात का पता चलने पर राजा को बहुत दुख हुआ। संतान शोक में वह आत्म हत्या का मन बना लिया। परंतु जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक सुंदर देवी प्रकट हुईं।

देवी ने राजा को कहा कि मैं षष्टी देवी हूं। मैं लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण कर देती हूं। यदि तुम मेरी पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी। देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया।

राजा और उनकी पत्नी ने कार्तिक शुक्ल की षष्टी तिथि के दिन देवी षष्टी की पूरे विधि -विधान से पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई।

तभी से छठ का पावन पर्व मनाया जाने लगा।छठ व्रत के संदर्भ में एक अन्य कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया।

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