घर में कैसे करें नवरात्रि की पूजा

नवरात्रि हिंदूओं के द्वारा मनाया जाने वाला सबसे प्रमुख त्योहार है। इसमें मां के अलग-अलग नौ रूपों की पूजा होती है। नवरात्रि के नौ दिनों में मां के अलग-अलग रुपों की पूजा को शक्ति को रुप में देखा जाता है। मां के अलग-अलग नौ रुप इस प्रकार है – मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रि।
आइए जानते है इन नौ देवियों कि घर में कैसे करें नवरात्रि की पूजा।

चैत्र नवरात्रि पूजा के नौ दिन

नवरात्रि पर नौ दिनों तक मां के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है।

  1. 25 मार्च- प्रथमा तिथि,  गुड़ी पड़वा और नवरात्रि आरंभ – पहले दिन घटस्थापना और मां शैलपुत्री की पूजा
  2. 26 मार्च- द्वितीया तिथि, सर्वार्थ सिद्धि योग – दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी की पूजा
  3. 27 मार्च- तृतीया तिथि, सर्वार्थ सिद्धि योग – नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा की पूजा का विधान है।
  4. 28 मार्च- चतुर्थी तिथि – चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा होती है।
  5. 29 मार्च- पंचमी तिथि, रवि योग – पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा
  6. 30 मार्च- षष्ठी तिथि – छठे दिन कात्यायनी की पूजा
  7. 31 मार्च- सप्तमी तिथि – सातवें दिन कालरात्रि की शक्ति उपासना होता है।
  8. 1 अप्रैल- अष्टमी तिथि – आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है।
  9. 2 अप्रैल- नवमी तिथि – नौवें दिन मां सिद्धिदात्रि की आराधना की जाती है।

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नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना होती है। इसके बाद लगातार नौ दिनों तक मां की पूजा व उपवास को किया जाता है। दसवें दिन कन्या पूजन के कर के यह उपवास खोला जाता है। आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाले नवरात्र गुप्त नवरात्र होते हैं। हालांकि गुप्त नवरात्र को आमतौर पर मनाया नहीं जाता लेकिन तंत्र साधना करने वालों के लिये गुप्त नवरात्र बहुत ज्यादा मायने रखते हैं। तांत्रिकों द्वारा इस दौरान देवी मां की साधना की जाती है।

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पहले दिन नवरात्रि पूजा

नवरात्रि के पहले दिन माँ शैलपुत्री की आराधना का निर्माण होता है। इस साल 25 मार्च 2020 को माँ शैलपुत्री जी की पूजा की जाएगी। दुर्गा पूजा का त्यौहार साल में दो बार आता है, एक चैत्र मास में और दूसरा आश्विन मास में दोनों मासों में दुर्गा पूजा का विधान एक जैसा ही होता है, दोनों ही पक्ष की पहली तिथि से दशमी तिथि तक मनायी जाती है। माँ शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल का पुष्प लिए अपने वाहन वृषभ पर विराजमान होतीं हैं। शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया है।

शैलपुत्री पूजा विधि

दुर्गा को स्नेह, करूणा और ममता का स्वरूप मानकर हम इनकी पूज करते हैं। और इनकी पूजा में सभी तीर्थों, नदियों, समुद्रों, नवग्रहों, दिक्पालों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी योगिनियों को भी आमंत्रित किया जाता है और कलश में उन्हें विराजने हेतु प्रार्थना के साथ-साथ उनका आहवान किया जाता है। शारदीय नवरात्र पर कलश स्थापना के साथ ही माँ दुर्गा की पूजा शुरू होती है। पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है। कलश में सप्तमृतिका यानी सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेट किया जाता है।

इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ उगाए जाते हैं और इससे सभी देवी-देवता की पूजा की जाती है। इसे जयन्ती कहा जाता हैं जिसे इस मंत्र के साथ अर्पित किया जाता है “जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते”। इसी मंत्र से पुरोहित यजमान के परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर जयंती डालकर सुख, सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद देते हैं।

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ा शूलधरां यशस्विनीम्॥

शैलपुत्री पूजन महत्व

देवी दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल के बीच में स्थापित होती है और उनके दोनों तरफ यानी दायीं तरफ देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा होती है और बायीं तरफ कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी होती है। इसके साथ-साथ भगवान भोले नाथ की पूजा होती है। पूजा के पहले दिन “शैलपुत्री” के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती है।

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दूसरे दिन नवरात्रि पूजा

नवरात्रि के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। ब्रह्मचारिणी जी की पूजा 26 मार्च 2020 को होगी। देवी ब्रह्मचारिणी का रूप तपस्विनी जैसा होता है। माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। इसमें जीवन की अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का नाश होता है। देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है।

ब्रह्मचारिणी पूजा

देवी ब्रह्मचारिणी जी की पूजा का विधान कुछ इस प्रकार है- सबसे पहले आपने जिन देवी-देवताओ एवं गणों व योगिनियों को कलश में आमत्रित किया है उनकी फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से आपको उनकी पूजा करनी है और उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करा लें और देवी को जो कुछ भी प्रसाद आप अर्पित कर रहे हैं उसमें से एक अंश इन्हें भी अर्पण करें। प्रसाद के बाद आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट करें और इनकी परिक्रमा करें।
देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें “दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा” इसके चलते देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर अच्छी तरह से से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें देवी को अरूहूल का फूल, कमल काफी पसंद है उनकी माला पहनायें। प्रसाद और आचमन के पश्चात् पान सुपारी भेंट कर प्रदक्षिणा करें और घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें।

इस प्रकार देवी की प्रतिमा की पंचोपचार सहित पूजा करते हैं उनकी साधना सफल हो जाती है। दुर्गा पूजा में नवरात्रे के नौ दिनों तक देवी धरती पर रहती हैं अत: यह साधना का अत्यंत सुन्दर और उत्तम समय होता है। इस समय जो व्यक्ति भक्ति भाव एवं श्रद्धा से दुर्गा पूजा के दूसरे दिन मॉ ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं उन्हें सुख, आरोग्य की प्राप्ति होती है। देवी ब्रह्मचारिणी का भक्त जीवन में सदा शांत-चित्त और प्रसन्न रहता है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं सताता है।

ब्रह्मचारिणी पूजा का महत्व

देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूरी तरह से जगमगाता हुआ है। मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से द्वितीय शक्ति देवी ब्रह्मचारिणी की है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली मां ब्रह्मचारिणी। यह देवी शांत और निमग्न होकर तप में लीन हैं। देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला होती है और बायें हाथ में कमण्डल होता है। देवी को कई अन्य नामों से जाना जाता है। जैसे तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा से भी पुकारा जाता है। इस दिन साधक का मन एकाग्रता की तरफ अग्रसर होता है। अपने मन को इस ओर उन्मुख करके भक्त मां ब्रह्मचारिणी जी की कृपा और भक्ति को प्राप्त करता है।

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तीसरे दिन नवरात्रि पूजा

नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। मां दुर्गा की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। यह 27 मार्च 2020 को देवी चंद्रघंटा की पूजा की जाएगी। चन्द्रघंटा देवी का स्वरूप तपे हुए स्वर्ण के समान चमकदार है। माता के सिर पर अर्ध चंद्रमा मंदिर के घंटे के आकार में अत्यंत शोभायमान् हो रहा जिसकी वजह से देवी का नाम चन्द्रघंटा हो गया। मां चन्द्रघंटा अपने प्रिय वाहन सिंह पर आरूढ़ होकर अपने दस हाथों में खड्ग, तलवार, ढाल, गदा, पाश, त्रिशूल, चक्र,धनुष, भरे हुए तरकश लिए मंद मंद मुस्कुरा रही होती हैं। माता का ये अदभुत रूप देखकर ऋषिगण मुग्ध हो जाते हैं और वेद मंत्रों के द्वारा देवी चन्द्रघंटा की स्तुति करने लगते हैं। स्तुति एवं प्रार्थना करने से देवी चन्द्रघंटा का आशिर्वाद आपको प्राप्त होता है। माँ चन्द्रघंटा की कृपा से समस्त पाप और बाधाएँ का नाश हो जाता हैं। इनके उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है इनकी अराधना सद्य: फलदायी है।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।

चंद्रघंटा पूजा

देवी चन्द्रघंटा की भक्ति से आध्यात्मिक और आत्मिक दोनो शक्ति प्राप्त होती है। जो व्यक्ति माँ चंद्रघंटा की श्रद्धा एवं भक्ति से पूजा करता है उस व्यक्ति को मां की कृपा प्राप्त होती है जिससे वह संसार में यश, कीर्ति एवं सम्मान प्राप्त करता है। देवी की पंचोपचार के साथ पूजा करने के बाद उनका आशीर्वाद प्राप्त कर के योग का अभ्यास करने से साधक को अपने प्रयास में आसानी से सफलता मिल जाती है।

तीसरे दिन की पूजा का विधान भी उसी प्रकार होता है जैसे आपने दूसरे दिन पूजा की होती है ठीक उसी तरह आप तीसरे दिन भी पूजा कर सकते है। इस दिन भी आप सबसे पहले कलश और उसमें उपस्थित देवी-देवता, तीर्थों, योगिनियों, नवग्रहों, दशदिक्पालों, ग्रम एवं नगर देवता की पूजा अराधना करें फिर देवी चन्द्रघंटा की पूजा अर्चना करें। देवी की पूजा के पश्चात भगवान शंकर और ब्रह्मा की पूजा करें। मन, वचन और कर्म के साथ विधि-विधान के साथ शुद्ध मन से चंद्रघंटा की उपासना-आराधना करना चाहिए, इससे सारे कष्टों से मुक्ती मिल जाती है।

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चौथे दिन नवरात्रि पूजा

नवरात्रि के चौथे दिन देवी कूष्माण्डा जी की पूजा होती है। इस साल 28 मार्च 2020 को यह पूजा की जाएगी है। देवी कूष्माण्डा अपनी मन्द मुस्कान से अण्ड और ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने की वजह से इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है। इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और शांत मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा की जानी चाहिए।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

कुष्मांडा पौराणिक महत्व

देवी कुष्मांडा जिनका मुखमंड सैकड़ों सूर्य की प्रभा से चमकता है। जिस प्रकार फूल में अण्ड का जन्म होता है उसी तरह कुसुम अर्थात फूल के समान मां की हंसी से सृष्टि में इस ब्रह्मण्ड का जन्म हुआ इसके साथ-साथ यह देवी कूष्माण्डा के रूप में विख्यात हुई। इस देवी का निवास सूर्यमण्डल के बीच से और यह सूर्य मंडल को अपने संकेत से नियंत्रित रखती हैं। देवी अपने इन हाथों में क्रम के अनुसार कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत से भरा कलश, चक्र तथा गदा है। देवी के आठवें हाथ में बिजरंके की माला होती है, यह माला भक्तों को सभी प्रकार की ऋद्धि सिद्धि देने वाला होता है। देवी अपने प्रिय वाहन सिंह पर सवार होती हैं। जो भक्त श्रद्धा पूर्वक इस देवी की उपासना दुर्गा पूजा के चौथे दिन करता है उसके सभी प्रकार के कष्ट रोग, शोक नष्ट हो जाते है इसके साथ-साथ आयु और यश की भी प्राप्ति होती है।

कुष्मांडा पूजा

इस दिन भी आप सबसे पहले कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करें फिर माता के परिवार में शामिल देवी देवता की पूजा करें जो देवी की मूर्ति के दोनों तरफ विरजामन हैं। इनकी पूजा के चलते देवी कूष्माण्डा की भी पूजा करे। पूजा की विधि शुरू करने से पहले हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर इस मंत्र का ध्यान करें “सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च. दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे..देवी की पूजा के पश्चात महादेव और श्री हरि की पूजा देवी लक्ष्मी के साथ ही करनी चाहिए। आप अपने मन को माता के चरणों में स्थापित करके आपको माता का आशीर्वाद लेना चाहिए और साधना में बैठना चाहिए। इस प्रकार जो साधना करने वाला प्रयास करते हैं उन्हें भगवती कूष्माण्डा सफलता जरूर प्रदान होती हैं जिससे व्यक्ति के सभी प्रकार के भय से मुक्ती मिलती है और मां का अनुग्रह प्राप्त होता है।

पांचवें दिन नवरात्रि पूजा

नवरात्रि के पांचवे दिन स्कंद माता नाम प्राप्त हुआ है। माँ दुर्गा का पंचम रूप स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है। यह 29 मार्च 2020 को पांचवां नवरात्रा संपन्न होगा। संतान प्राप्ति हेतु इनकी पूजा फलदायी होती है। स्कंद माता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं। एकाग्रभाव से मन को पवित्र करके माँ की स्तुति करने से दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ हो जाता है। माँ कमल के पुष्प पर विराजित अभय मुद्रा में होती हैं, स्कंदमाता को पद्मासना देवी तथा विद्यावाहिनी दुर्गा कहा जाता है।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

स्कन्द माता पौराणिक महत्व

देवी स्कन्द माता ही हिमालय की पुत्री पार्वती हैं इन्हें ही माहेश्वरी और गौरी के नाम से जाना जाता है। यह पर्वत राज की पुत्री होने से पार्वती कहलाती हैं, देवी स्कन्द माता के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गा पूजा के पांचवे दिन देवताओं के सेनापति कुमार कार्तिकेय की माता की पूजा की जाती है। माता इस रूप में पूर्णत: ममता लुटाती हुई नज़र आती हैं। माता का पांचवा रूप शुभ्र अर्थात श्वेत है। माता की चार भुजाएं हैं और ये कमल आसन पर विराजमान होती हैं।

जब अत्याचारी दानवों का अत्याचार बढ़ता है तब माता संत जनों की रक्षा के लिए सिंह पर सवार होकर दुष्टों का खातमा करती हैं। देवी स्कन्दमाता की चार भुजाएं होती हैं, माता अपने दो हाथों में कमल के फूल को धारण करती हैं साथ ही एक भुजा में भगवान स्कन्द या कुमार कार्तिकेय को सहारा देकर अपनी गोद में लिये बैठी हैं। मां का चौथा हाथ भक्तो को आशीर्वाद देने की मुद्रा मे  होता है।

स्कन्दमाता पूजा

दुर्गा पूजा के लिए साधक को पहले मां की विधि के साथ पूजा करनी चाहिए। पूजा के लिए कुश अथवा कम्बल के पवित्र आसन पर बैठकर पूजा प्रक्रिया को उसी प्रकार से शुरू करना चाहिए जैसे आपने अब तक के आपने चार दिनों में किया है फिर इस मंत्र से देवी की प्रार्थना करनी चाहिए। अब पंचोपचार विधि से देवी स्कन्दमाता की पूजा करनी होती है। देवी की पूजा के चलते शिव शंकर और ब्रह्मा जी की पूजा करनी होती है यही शास्त्रोक्त नियम है। जो भक्त देवी स्कन्द माता की भक्ति-भाव सहित पूजन करते हैं उसे देवी की कृपा प्राप्त होती है। देवी की कृपा से भक्त की मुराद पूरी होती है और घर में सुख, शांति एवं समृद्धि रहती है।

छठे दिन नवरात्रि पूजा

नवरात्रि के छठे दिन माँ कात्यायनी की पूजा होती है। यह 30 मार्च 2020 को कात्यायनी पूजा की जाएगी। इस उपलक्ष पर माता की आराधना एवं भंडारों की तैयारी की जाती है। देवी कात्यायनी शत्रुओं का नाश करने वाली होती है। देवी कात्यायनी अमोद्य फलदायिनी हैं इनकी पूजा अर्चना के चलते सभी संकटों का खातमा हो जाता है, माँ कात्यायनी दानवों तथा पापियों का नाश करने वाली होती हैं। महर्षि कात्यायन की संतान के रूप में जन्म लेने के वजह से इन्हें कात्यायनी नाम की प्राप्ती हुई है। देवी कात्यायनी जी के पूजन से भक्त के भीतर अद्भुत शक्ति का संचार होता है।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

कात्यायनी पौराणिक महत्व

देवी कात्यायनी जी के संदर्भ में एक पौराणिक कथा बहुत ही ज्यादा प्रचलित है जिसके अनुसार एक समय निर्मली नाम के प्रसिद्ध ॠषि हुए तथा उनके पुत्र ॠषि कात्य हुए, उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध कात्य गोत्र से ॠषि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। महर्षि कात्यायन जी की इच्छा थी कि भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें। देवी ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार की तथा अश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेने के पश्चात शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी, तीन दिनों तक कात्यायन ॠषि ने इनकी पूजा की, दशमी को देवी ने महिषासुर का वध किया ओर देवों को महिषासुर के अत्याचारों से मुक्त कर दिया। महर्षि कात्यायन जी ने देवी पालन पोषण किया। जब महिषासुर नामक राक्षस का अत्याचार बहुत ज्यादा बढ़ गया था, तब उसका विनाश करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने अपने तेज़ और प्रताप का अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था और ॠषि कात्यायन ने भगवती जी कि कठिन तपस्या, पूजा की इसी कारण से यह देवी कात्यायनी कहलायीं।

माँ कात्यायनी पूजा

दुर्गा पूजा के छठे दिन माँ कात्यायनी जी की सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए और मां का आशीर्वाद लेना चाहिए इसके साथ साधना में भी बैठना चाहिए। इस प्रकार जो साधक प्रयास करते हैं उन्हें भगवती कात्यायनी सभी प्रकार के भय से मुक्त कर देती हैं। माँ कात्यायनी की भक्ति से मनुष्य को अर्थ, कर्म, काम, मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यन्त दिव्य और स्वर्ण के समान चमकीला है।
यह अपनी सबसे प्रिय सवारी सिंह पर विराजमान रहती हैं। इनकी चार भुजायें भक्तों को वरदान देती हैं, इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है, तो दूसरा हाथ वरदमुद्रा में है अन्य हाथों में  तलवार तथा कमल का फूल है। पूजा के दिन सबसे पहले कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करें और फिर माता के परिवार में शामिल देवी देवता की पूजा करें जो देवी की प्रतिमा के दोनों तरफ विरजामन होती हैं। इनकी पूजा के चलते देवी कात्यायनी जी की पूजा कि जाती है। पूजा की विधि शुरू करने पर हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम करें और देवी के मंत्र का ध्यान किया जाता है।

सातवें दिन का नवरात्रि

नवरात्रि के सातवें दिन माँ काल रात्रि की उपासना का विधान होता है। यह 31 मार्च 2020 को माँ कालरात्री जी की पूजा की जाती है। माँ कालरात्रि अपने भक्तों को सदैव शुभ फल प्रदान करने वाली होती हैं इसी वजह से इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है। मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, इनका वर्ण अंधकार की भाँति काला है, इनके केश बिखरे हुए होते हैं, कंठ में विद्युत की चमक वाली माला है, माँ कालरात्रि के तीन नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह विशाल व गोल हैं, जिनमें से बिजली के प्रकार किरणें निकलती हैं, इनकी नासिका से श्वास तथा निःश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती हैं। माँ का यह भय उत्पन्न करने वाला स्वरूप केवल पापियों का नाश करने के लिए ही होता है।

कालरात्रि पौराणिक महत्व

देवी काल-रात्रि का वर्ण काजल के समान काले रंग का है जो अमावस की रात्रि से भी अधिक काला है। मां कालरात्रि के तीन बड़े बड़े उभरे हुए नेत्र हैं जिनसे मां अपने भक्तों पर अनुकम्पा की दृष्टि रखती हैं। देवी कालरात्रि के बाल खुले हुए होते हैं और हवाओं में लहरा रहे होते हैं। देवी काल रात्रि गर्दभ पर सवार हैं। मां का वर्ण काला होने पर भी कांतिमय और बेहद अद्भुत दिखाई देता है। देवी कालरात्रि का यह विचित्र रूप भक्तों के लिए अत्यंत शुभल होते है अत: देवी को शुभंकरी भी कहा गया है।

कालरात्रि पूजा

दुर्गा पूजा का सातवां दिन तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए अति महत्वपूर्ण होता है। तंत्र साधना करने वाले साधक मध्य रात्रि में देवी की तांत्रिक विधि से पूजा करते हैं। इस दिन मां की आंखें खुलती हैं। दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि का काफी महत्व बताया गया है। इस दिन से भक्त जनों के लिए देवी मां का दरवाज़ा खुल जाता है और भक्तगण पूजा स्थलों पर देवी के दर्शन हेतु पूजा स्थल पर जुटने लगते हैं। पूजा सुबह के समय में अन्य दिनों की तरह ही होती परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी की पूजा की जाती है।
सप्तमी की रात्रि ‘सिद्धियों’ की रात भी कही जाती है। कुण्डलिनी जागरण हेतु जो साधक साधना करने में लगे होते हैं आज सहस्त्रसार चक्र का भेदन करते हैं। पूजा विधान में शास्त्रों में जैसा वर्णित हैं उसके अनुसार पहले कलश की पूजा करनी चाहिए फिर नवग्रह, दशदिक्पाल, देवी के परिवार में उपस्थित देवी देवता की पूजा होती है और फिर मां कालरात्रि की पूजा करनी होती है। देवी की पूजा से पहले उनका ध्यान करना चाहिए, देवी की पूजा के बाद शिव और ब्रह्मा जी की पूजा भी अवश्य करनी होती है।

आठवें दिन नवरात्रि पूजा

नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी की पूजा अर्चना की जाती है। यह 1 अप्रैल 2020 को अष्टमी तिथि होगी। महागौरी आदी शक्ति हैं इनके तेज से संपूर्ण सृष्टि प्रकाश-मान है इनकी शक्ति अचूक फलदायिनी होती है। महागौरी की चार भुजाएं होती हैं उनकी दायीं भुजा अभय मुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में त्रिशूल शोभता है। बायीं भुजा में डमरू डम डम बज रहा है और नीचे वाली भुजा से देवी गौरी भक्तों की प्रार्थना सुनकर वरदान देती हैं।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

महागौरी पौराणिक महत्व

दुर्गा सप्तशती में शुभ निशुम्भ से पराजित होकर गंगा के तट पर जिस देवी की प्रार्थना देवतागण कर रहे थे वह महागौरी हैं। देवी गौरी के अंश से ही कौशिकी का जन्म हुआ जिसने शुम्भ निशुम्भ के प्रकोप से देवताओं को मुक्त कराया गया। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं, पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई देते है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ गया।

महागौरी पूजन

नवरात्रे के दसों दिन कुवारी कन्या को भोजन कराने का विधान होता है लेकिन अष्टमी वाले दिन इसका विशेष महत्व होता है। इस दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं। साथ ही देवी गौरी  की पूजा का विधान भी ज्यों का त्यों होता है अर्थात जिस प्रकार सप्तमी तिथि तक आपने मां की पूजा की है उसी प्रकार अष्टमी के दिन भी देवी की पंचोपचार सहित पूजा करें। कन्या या कंजक पूजन में सामर्थ्य के अनुसार इन कन्याओं को भोजन के लिए आमंत्रित करते हैं। एक से दस साल तक की कन्याओं का पूजन किया जाता है।
इससे अधिक उम्र की कन्याओं को देवी पूजन में त्याग माना जाता है। कन्या पूजन में सर्वप्रथम कन्याओं के पैर धुलाकर उन्हें आसन पर एक पंक्ति में बिठाते हैं। और मंत्र के द्वारा कन्याओं का पंचोपचार पूजा करते हैं। विधिवत कुंकुम से तिलक करने के उपरांत उनकी कलाईयों पर कलावा बांधा जाता है। इसके साथ-साथ उन्हें हलवा, पूरी तथा रुचि के अनुसार भोजन कराया जाता हैं। पूजा करने के पश्चात जब कन्याएं भोजन ग्रहण कर लें तो उनसे आशीर्वाद प्राप्त करें और यथासामर्थ्य कोई भी भेंट तथा दक्षिणा दें कर विदा करें। इसी प्रकार श्रद्धा पूर्वक अष्टमी पूजन करने से भक्तों की समस्त इच्छाएं पूरी हो जाती हैं।

नौवें दिन नवरात्रि पूजा

नवरात्रि के नौवें दिन मां दुर्गा जी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्रि-पूजा के नौवें शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है। पुराण के अनुसार ये आठ सिद्धियां होती हैं – अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्री कृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है।

या देवी सर्वभू‍तेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन

अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजा की जाती है। नवरात्रि के दिनों में कुछ लोग अष्टमी और कुछ नवमी के दिन कन्या पूजा करते हैं। परिवार कि परंपरा के अनुसार किसी भी दिन कन्या पूजा को किया जा सकता है।

3 से 9 साल तक की आयु की कन्याओं तथा साथ ही एक लांगुरिया यानी छोटे लड़के को खीर, पूरी, हलवा, चने की सब्जी आदि खिलाई जाती हैं।

कन्याओं को तिलक लगा कें  हाथ में कलावा बांधकर, गिफ्ट और दक्षिणा आदि देकर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है उसके बाद ही कन्याओं को विदा किया जाता है।

महानवमी पूजन और विसर्जन

नवमी वाले दिन मां की विशेष पूजा की जाती है और दोबारा पधारने का आवाहन कर, स्वस्थान विदाहोने के लिए प्रार्थना की जाती है।

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