जानिए श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व

जानिए श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व

भारत भर में मनाए जाने वाले महोत्सवों में जगन्नाथपुरी की रथयात्रा सबसे महत्वपूर्ण है। यह परंपरागत रथयात्रा न सिर्फ हिन्दुस्तान, बल्कि विदेशी श्रद्धालुओं के भी आकर्षण का केंद्र है। श्रीकृष्ण के अवतार जगन्नाथ की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना गया है। उड़ीसा के पूर्वी तट पर स्थित श्री जगन्नाथ पुरी में भगवान श्री जगन्नाथ जी का भव्य मंदिर है जिनकी रथ-यात्रा का उत्सव पारंपरिक रीति के अनुसार बड़े धूमधाम से आयोजित किया जाता है। जगन्नाथ रथ उत्सव आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया से आरंभ करके शुक्ल एकादशी तक मनाया जाता है। इस दौरान रथ को अपने हाथों से खिंचना बेहद शुभ माना जाता है। जगन्नाथ पुरी मंदिर में हर साल दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु इस भव्य समारोह में भाग लेने के लिए आते हैं। जगन्नाथपुरी का महत्व वर्णनातीत है। वेद, उपनिषद् तथा पुराणों में पुरुषोत्तम की प्रशस्ति वर्णित है। श्री जगन्नाथ जी का दूसरा नाम पुरुषोत्तम और धाम का नाम भी पुरुषोत्तम है। यह परम रहस्यमय देवता हैं। वे शैवों के लिए शिव, वेदान्तियों के लिए ब्रह्म, जैनियों के लिए ऋषभनाथ और गाणपत्यों के लिए गणेश हैं।

परम पवित्र धाम है जगन्नाथ धाम –

कलियुग में पुरी धाम को सर्वोपरि  पवित्र धाम माना गया है। श्री जगन्नाथ जी के प्राकट्य की रहस्यमय कथा ब्रह्म पुराण तथा स्कंद पुराण में वर्णित है। जगन्नाथ जी अजन्मा और सर्वव्यापक होने पर भी दारुब्रह्म के रूप में अपनी अद्भूत लीला दर्शाते आ रहे हैं। श्री जगन्नाथ जी की द्वादश यात्राओं में गुण्डिचा यात्रा मुख्य है। यहीं मंदिर में विश्वकर्मा ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र तथा उनकी बहिन सुभद्रा जी की दारु प्रतिमाएं बनाई थीं। महाराज इंद्रद्युम्र तथा उनकी पत्‍‌नी विमला की भक्ति व श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें इन मूर्तियों को प्रतिष्ठित करने का आदेश दिया था। श्री जगन्नाथ पुरी रथयात्रा के महत्व व परिणामों का विस्तृत वर्णन पुराणों में मिलता है। उस समय रथ पर विराजमान होकर यात्रा करते हुए श्री जगन्नाथ जी का लोग भक्ति पूर्वक दर्शन करते हैं, उनका भगवान के धाम में निवास होता है। जो श्रेष्ठ पुरुष रथ के आगे नृत्य करके गाते हैं, वे मोक्ष प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य रथ के आगे खड़े होकर चंवर, व्यंजन, फूल के गुच्छों अथवा वस्त्रों से भगवान पुरुषोत्तम को हवा करते हैं, वह ब्रह्मलोक में जाकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। इस समय दिया-दान भी अक्षय फल प्रदान करता है। स्कंद पुराण के अनुसार राजा इंद्रद्युम्र को स्वयं भगवान ने कहा कि उनका जन्म स्थान उन्हें अत्यंत प्रिय है, अत: वे वर्ष में एक बार वहां अवश्य आएंगे।

जगन्नाथ रथयात्रा का इतिहास –

रथयात्रा में तीनों रथों के विभिन्न नाम परम्परागत हैं। बलभद्र जी के रथ का नाम तालध्वज, सुभद्रा जी के रथ का नाम देवदलन और जगन्नाथ जी के रथ का नाम नन्दीघोष है। पुरी के महाराजा प्रथम सेवक होने के नाते रथों को सोने की झाड़ू से बुहारते हैं तथा उसके बाद रथों को खींचा जाता है। ये रथ प्रतिवर्ष लकड़ी के बनाये जाते हैं और इनमें तीनों विग्रह भी काष्ठ के होते हैं। काष्ठ के विग्रहावतार धारण करने के विषय में एक प्रसंग है कि एक बार भक्तों के अधीन होकर और भक्तों की श्रेष्ठता दिखाते हुए भगवान ने प्रतिज्ञा की थी कि मैं चित्ररथ गन्धर्व को न मार डालूं तो मेरा कलियुग में काष्ठ का विग्रह हो। उस ऋषि के अपराध करने वाले गन्धर्व को अर्जुन और सुभद्रा ने अभयदान दिया था। भगवान ने भक्तों के सामने हार मानी और वे श्री क्षेत्र जगन्नाथ में काष्ठ विग्रह के रूप में प्रतिष्ठित हुए। रथयात्रा में विभिन्न स्थानीय पारंपरिक रीति-रिवाजों को बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाया जाता है। रथयात्रा उत्सव दस दिनों तक मनाया जाता है। वैष्णवों की यह मान्यता है कि राधा और श्रीकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक स्वयं जगन्नाथ जी हैं क्योंकि वे ही पूर्ण परब्रह्म हैं। इस प्रकार पुरी की रथयात्रा पारंपरिक प्राचीन प्रथा का निर्वहन है जो जन-जन को भगवान का सामीप्य प्रदान कराने हेतु है। रथारूढ़ भगवान जगन्नाथ के दर्शन मात्र से मनुष्य को जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।

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