जनेऊ के पीछे का विज्ञान

सफ़ेद पवित्र धागे को जनेऊ कहते है जो एक पतली डोरी होती है जिसे ब्राहमण लड़के 12 वर्ष की आयु में पहुँचने के बाद धारण करते है. हिन्दू रीति के अनुसार ब्राहमण लड़कों में जनेऊ धारण करने की प्रथा 16 वें संस्कार का भाग होती है. जनेऊ को उपनयन संस्कार में धारण किया जाता है जो हिन्दू धर्म में सनातन धर्म का 10वां संस्कार होता है. ये जनेऊ पवित्र दृष्टि का प्रतीक है जिससे चीजें एक जैसी दिखती है.

बहुत सारे लोग पवित्र जनेऊ धागे को धारण करने के विज्ञान और लाभ से अनजान है. आइए, इनमें से कुछ को जानते है.

 

The Science Behind Janaeu

 

अगर जनेऊ किसी के कान में लगाकर बांध दी जाती है तो यह उसके याददाश्त को बढ़ाने में सहायता करता है और कब्ज को भी दूर करने में सहायक होता है जो पेट को सभी बिमारियों से मुक्त रखता है. जिन तीन धागों से जनेऊ बनते है वो शक्ति की देवी पार्वती, धन की देवी लक्ष्मी और ज्ञान की देवी सरस्वती को दर्शाते है. ऐसा कहा जाता है की किसी को केवल तभी एक अच्छा जीवन मिल सकता है जब वो इन तीन विशेषताओं वाले धागे को जो तीन देवियों के गुणों को धारण करता है. एक प्रसिद्ध मान्यता है की अगर कोई जनेऊ को धारण करता है तो उस इन्सान की किसी भी नकारात्मक ऊर्जा या सोच से पूरी जीवन तक सुरक्षा होती है. एक वैज्ञानिक अध्यन है जिसके अनुसार जनेऊ धारण करने वाले को , जनेऊ नहीं पहनने वालों की अपेक्षा उच्च रक्तचाप सबंधित रोग नहीं होते है. यह ब्रहमिन युवकों के ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता को बढ़ाता है और उसे प्रेरित करता है. मृत्यु के पश्चात मोक्ष या मुक्ति पाने में यह सहायता करता है. ऐसा कहा जाता है की उपनयन संस्कार के बाद एक ब्राहमण पूजा और अन्य रस्म कराना आरम्भ कर सकता है.

यहाँ जनेऊ या पवित्र धागे से संबंधित कुछ अन्य रोचक तथ्य है :

 

The Science Behind Janaeu

 

ऐसा कहा जाता है की एक बार जनेऊ धारण कर लेने के बाद इसे पहनने वाले के शरीर से निकाला नहीं जा सकता. अगर किसी कारण, जनेऊ टूट जाती है अथवा खो जाती है तो उसके बजाए नए जनेऊ को बांधा जाता है और पुराने वाले को पुनः उपयोग में नहीं लाना चाहिए. अविवाहित नवयुवक पवित्र धागे को तीन लड़ी में पहनते है. विवाहित पुरुष इस पवित्र धागे को छः लड़ी में पहनते है. और जिन पुरुषों के माता-पिता जीवित नहीं है वो नौ लड़ी में पवित्र धागे पहनते है. जनेऊ धारण करने के पहले गायत्री मंत्र का जप किया जाता है, गायत्री मंत्र इस प्रकार है :

|| ॐ भूर भुवः स्वः

तत्स-वितुर वरेण्यम

भर्गो देवस्य धीमहि

धियों यों नः प्रचोद्यात ||

यह पहनने वाले की मुख्य जिम्मेदारी होती है की वो इस पवित्र धागे को साफ़ और पवित्र रखें.

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