महात्मा गाँधी बर्थडे जन्मकुंडली

महात्मा गाँधी बर्थडे जन्मकुंडली (ज्योतिषाचार्य सुनील बरमोला जी द्वारा)

नाम

:

महात्मा गाँधी

जन्म तिथि

:

02 अक्टूबर 1869

जन्म का समय

:

08:36 AM

जन्म स्थान

:

पोरबंदर ( गुजरात )

भारत वर्ष को स्वतंत्रता दिलाने वाले व सत्य और अहिंसा के पुजारी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्तूबर 1869 को पोरबंदर, गुजरात में हुआ था । इनका विवाह 13 वर्ष की आयु में हो गया था।

बड़े होकर इन्होंने बाल विवाह का विरोध किया। 1885 ई. में गांधी जी के पिता जी की मृत्यु के पश्चात् परिवार के एक करीबी मित्र ने कहा था कि यदि गांधी को पोरबंदर में अपने पिताजी की जगह लेनी है तो इंग्लैंड में तीन साल बिताकर कानून की पढ़ाई करनी चाहिए।

गांधी जी ने इस सुझाव का स्वागत किया लेकिन इनकी मां के विरोध करने पर इन्होंने अपनी मां को बचन दिया कि इंग्लैंड मे रहते हुए यह शराब, मांस और महिला को सपर्श नहीं करेंगे तथा सत्य का पालन करेंगे। 04 सितंबर 1988 को गांधी जी इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए और 1891 में कानून की पढ़ाई पूरी करके स्वदेश लौट आए।

महात्मागाँधी जी के जीवन में ज्योतिषीय रहस्यमय घटनायें

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महात्मा गांधी की कुंडली का ज्योतिषीय विश्लेषण- गांधी जी का जन्म तुला लग्न कर्क राशि में होने कारण यह संतुलित व व्यवस्थित मस्तिष्क के व्यक्ति थे। इनकी कुंडली में बलवान मंगल के लग्न में बैठकर शुभ ग्रहों से युक्त और दृष्ट होने से गांधी जी पराक्रमी और प्रभावशाली व्यक्ति बने।

इन्हें समस्त भारत की जनता का समर्थन प्राप्त हुआ, फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार अपार जन समर्थन वाले लोकप्रिय गांधी से घबराने लगी। मंगल काल पुरुष का बल है और अपने पक्के घर में बलवान है।

बल के अंतर्गत प्रभाव व प्रराक्रम भी आ जाता है फलतः बली मंगल व्यक्ति के व्यक्तिगत, सामाजिक व राजनैतिक प्रभाव को बढ़ाता है। इनका मंगल योगकारक शनि व गुरु अधिष्ठित राशि का स्वामी होकर लग्नेश व भाग्येश से युक्त तथा पराक्रमेश गुरु से दृष्ट है।

इनकी कुंडली में कई राज योग हैं जैसे श्री योग, छत्र योग, मालव्य योग, गजकेसरी योग आदि। श्री योग-यदि द्वितीयेश व भाग्येश केंद्रों में हो तथा इन केंद्रों के स्वामियों पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो ऐसा व्यक्ति सुयोग्य मंत्री, राजा से से प्रतिष्ठित शत्रुओं पर विजय पाने वाला तथा अनेक देशों का मालिक होता है।

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गांधी जी का छत्र योग पूर्णतया फलीभूत हुआ और राष्ट्रपिता बन गए। सभी केंद्रों में ग्रह होने कारण तथा दशमेश चंद्र के दशमस्थ होने से तथा बली गजकेसरी योग, बलीे गुरु, शुक्र व बुध के कारण इन्हें अक्षय कीर्ति की प्राप्ति हुई। लग्न व लग्नेश के पापकर्तरी में होने से तथा चंद्रमा के राहू से युक्त होने के कारण इनकी कुंडली में जेल योग बन रहा है फलतः इन्हें बार-बार जेल जाना पड़ा।

सप्तम भाव में गुरु की स्थिति तथा सप्तमेश पर गुरु व बुध आदि सभी शुभ ग्रहों का प्रभाव होने के परिणामस्वरूप इनकी पत्नी उच्च विचारों वाली, सुसंस्कृत, महिला थीं। द्वितीयेश मंगल का शुभ ग्रहों से युक्त और दृष्ट होना इनके सत्यवादी होने की और संकेत करता है। मंगल पर केवल शुभ ग्रहों का प्रभाव होना इन्हें पराक्रमी तो बनाता है लेकिन इन्होंने अपनी लड़ाई में अपना सबसे बड़ा शस्त्र अहिंसा को बनाया।

मंगल लड़ाई का कारक है और इसके बली होने से लड़ाई में विजय प्राप्त होती है। यही कारण है कि इनका अहिंसा का उपदेश प्रभावशाली शस्त्र सिद्ध हुआ। गांधी जी का भारत में राजनैतिक जीवन आरंभ होते ही इसी मंगल की दशा आरंभ हो गई थी।

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गांधी जी की मंगल की दशा 1915 से 1922 तक चलती रही। सन 1921 में जन्मकुंडली के सूर्य पर गोचरीय गुरु व शनि का संयुक्त प्रभाव होने पर गांधी जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए। 1922 से 1940 तक राहु की महादशा में गांधी जी का वर्चस्व राजनैतिक गलियारों में क्रांतिकारी रूप लेने लगा तथा गांधी जी विश्व विखयात हो गए और विश्व के इतिहास में यह समय गांधी युग के नाम से जाना जाने लगा।

राहु राजनीति का कारक ग्रह माना जाता है। जिस कुंडली में उत्तम ग्रह योग हों जैसे श्रीयोग, छत्र योग, मालव्य योग, चतुः सागर योग, गजकेसरी योग तथा शुक्र बुध लग्न में हों, गुरु केंद्र में हों तो ऐसी स्थिति में दशम भाव में स्थित श्रेष्ठ राहु की महादशा राजनैतिक क्षेत्र में सफलता के लिए क्यों श्रेष्ठ नहीं होगी।

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दशमभाव से राज योग व कीर्ति का विचार किया जाता है। यदि कुंडली में श्रेष्ठ योग हों तो राज योगकारक ग्रह की दशा आने पर उत्तम परिणाम प्राप्त होते हैं। यदि कुंडली कमजोर हो तो खराब दशा और खराब गोचर के चलते विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। लेकिन गांधी जी की कुंडली में लग्नेश केंद्र में हैं, शुभ ग्रह केंद्र में तथा श्रेष्ठ योग हैं इस कारण उत्तम ग्रह की दशा ने गांधी को उस युग में विश्व का महानतम व्यक्ति बना दिया।

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय गांधी जी की कुंडली में पराक्रमेश गुरु की महादशा चल रही थी जिसके कारण ब्रिटिश सरकार गांधी जी की लोकप्रियता और जनसमर्थन के कारण कमजोर पड़ गई और अंततः सन 1947 में राष्ट्र को आजादी मिल गई।

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