Home आध्यात्मिकता मंगला गौरी व्रत का महत्व व पूजन विधि

मंगला गौरी व्रत का महत्व व पूजन विधि

पौराणिक धर्म ग्रंथों अनुसार श्रावण माह के हर मंगलवार को आने वाले व्रत को मंगला गौरी व्रत (पार्वतीजी) के नाम से ही जाना जाता है। माँ गौरा अर्थात् माता पार्वती का यह व्रत एक महत्वपूर्ण व्रत है। पुराणों के अनुसार, भगवान शिव-पार्वती को श्रावण माह अति प्रिय है। इसलिए यह व्रत श्रावण माह के मंगलवार को ही किया जाता है। इसलिए इसे मंगला गौरी भी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार इस व्रत को करने से सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। गौरी व्रत की वैसे कोई कथा नहीं है, लेकिन ये माना जाता है कि जिस तरह माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके कई व्रत कर शिव को पाया था वैसे ही लड़कियां कठिन जप तप करके शिव जैसा वर पाना चाहती है. हिंदू धर्म की कन्याओं को पूर्ण विश्वास है कि माता पार्वती की पूजा आराधना करने से उन्हें शिव जैसा ही वर मिलेगा ।

मंगला गौरी मंत्र

गौरी पद्मा शची मेधा, सावित्री विजया जया ।
देवसेना स्वधा स्वाहा, मातरो लोकमातरः॥

धृतिः पुष्टिस्तथा तुष्टिः, आत्मनः कुलदेवता ।
गणेशेनाधिका ह्येता, वृद्धौ पूज्याश्च षोडश॥

जानिए श्रवण मास शिव मंत्र

मंगला गौरी व्रत कथा का महत्व

माना जाता है कि श्रावण मास के मंगलवार को आने वाले सभी व्रत-उपवास मनुष्य के सुख-सौभाग्य में वृद्धि करते हैं। अपने पति व संतान की लंबी उम्र एवं सुखी जीवन की कामना के लिए महिलाएं खास तौर पर इस व्रत को करती है। सौभाग्य से जुडे़ होने की वजह से नवविवाहित दुल्हनें भी आदरपूर्वक एवं आत्मीयता से इस व्रत को करती है।

ज्योतिष के अनुसार मंगला गौरी का विशेष फल

ज्योतिषीयों के अनुसार जिन युवतियों और महिलाओं की कुंडली में वैवाहिक जीवन में कमी ‍ महसूस होती है अथवा शादी के बाद पति से अलग होने या तलाक हो जाने जैसे अशुभ योग निर्मित हो रहे हो, तो उन महिलाओं के लिए मंगला गौरी व्रत विशेष रूप से फलदायी है। अत: ऐसी महिलाओं को सोलह सोमवार के साथ-साथ मंगला गौरी का व्रत अवश्य रखना चाहिए।

माँ गौरी की कथा व पूजन-विधि

‘कुंकुमागुरुलिप्तांगा सर्वाभरणभूषिताम्।
 नीलकण्ठप्रियां गौरीं वन्देहं मंगलाह्वयाम्।।

 माता मंगला गौरी का विधि-विधान से षोडशोपचार पूजन किया जाता है। मां मंगला गौरी कथा के अनुसार – पुराने समय की बात है। एक शहर में धरमपाल नाम का एक व्यापारी रहता था। उसकी पत्नी खूबसूरत थी और उनके पास बहुत सारी धन-दौलत थी। लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। इस वजह से पति-पत्नी दोनों ही हमेशा दुखी रहते थे।  एक दि अचानक ईश्वर की कृपा से उनको पुत्र प्राप्ति हुई, लेकिन वह अल्पायु था। उसे यह श्राप मिला हुआ था कि सोलह वर्ष की उम्र में सर्प के काटने कारण उसकी मौत हो जाएगी। परन्तु ईश्वरीय कृपा से उसकी शादी सोलह वर्ष से पहले ही एक युवती से हुई, जिसकी माता मंगला गौरी व्रत किया करती थी।

परिणामस्वरूप उसने अपनी पुत्री के लिए एक ऐसे सुखी जीवन का आशीर्वाद प्राप्त किया था, जिसके कारण वह कभी विधवा नहीं हो सकती। इसी कारण धरमपाल के पुत्र ने 100 साल की लंबी आयु प्राप्त की। यदि आप इस लेख से जुड़ी और अधिक जानकारी चाहते हैं या आप अपने जीवन जुड़ी किसी भी समस्या से वंचित या परेशान हैं तो आप नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक कर हमारे ज्योतिशाचार्यो से जुड़ कर अपनी हर समस्याओं का समाधान प्राप्त कर अपना भौतिक जीवन सुखमय बना सकते हैं।

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