शनि जयंती का महत्व – अत्यधिक भयावह ग्रह का उत्सव

शनि जयंती , शनि देव के जन्म के रूप में मान्य है जिसे शनि अमावस्या के नाम से भी जानते है. स्कन्द पुराण के काशी भाग में भगवान् शनि की उत्पति का उल्लेख किया गया है. शनि देव का जन्म सूर्य देव या भगवान् सूर्य तथा छाया अथवा छावं की देवी से हुआ. यह शनि ग्रह तथा शनिवार के देवता है तथा हिन्दू ज्योतिष के अनुसार, हर एक के जीवन पर इनका प्रबल प्रभाव होता है. कुंडली में बुरे प्रभाव से बचने के लिए शनि की पूजा करने की सलाह दी जाती है , खासकर, जो लोग शनि साढ़ेसाती के प्रभाव से गुजर रहे हो वो शनिवार के दिन उपवास रखकर शनि देव की पूजा करें.

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शनि जयंती के पीछें की कहानी

Shani dev

ऐसा कहा जाता है की सूर्य देव ने शुरू में सरंयु से विवाह किया परंतु, चूंकि सूर्य देव के असहनीय ताप और तेज की वजह से उन्होंने उनका त्याग कर दिया और अपनी परछाईं छाया को छोड़कर तपस्या के लिए चली गयी.

शनि देव , सूर्य देव और छाया के पुत्र है. जब उनकी माता घोर तपस्या के लिए जा रही थी , भगवान् शिव ने इसी कारण , शनि देव को अंधकार का वरदान दिया जो घोर तपस्या का प्रतिक था जिसके वो स्वामी है.

मुहूर्त्त

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शनि जयंती , वैशाख विद्य चतुर्दशी अमावस्या के दिन मनायी जाती है , चूंकि, शनि देव का जन्म इसी दिन हुआ था. इस वर्ष शनि जयंती 25 मई 2017 को पड़ेगा. पूजा के लिए मुहूर्त्त कुछ इस प्रकार है :

अमावस्या तिथि का आरंभ = 25 / मई/ 2017 के दिन 05:08 पूर्वाह्न

अमावस्या तिथि का अंत : 26 / मई / 2017 के दिन 01:14 पूर्वाहन

शनि जयंती का महत्त्व

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प्राचीन वैदिक अवतरण के अनुसार , शनि को एक क्रूर ग्रह माना जाता है. ऐसी मान्यता है की शनि हमारे अतीत और वर्तमान के कर्मो के निर्णायक है. शनि धातु, उद्धोग क्षेत्र, मेहनत, गरीबी, और बीमारीयों के शुभचिंतक है. शनि ग्रह के कमजोर स्थिति के होने से व्यक्ति अपने जीवन में कठिन मेहनत से गुजरेगा तथा काफी मेहनत के बाद भी उसे बहुत कम सफलता प्राप्त होगी.

शनि हमें जीवन में सफलता पाने के लिए अनुशासन का पाठ सिखाते है. नकारात्मक प्रभाव से मुक्त के लिए उन चीजों के प्रति संलग्नता रखनी चाहिए जो लाभदायक है. भगवान् शनि को प्रसन्न करने के लिए लोग अनेक तरह की पूजा करते है. शनि जयंती शनि देव को संतुष्ट करने के लिए सबसे आसान माना जाता है और एक सफल जीवन के लिए उनका आशीर्वाद पाया जाता है.

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शनि जयंती पर निभाई जाने वाली रस्में

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शनि जयंती पर , शनि मंदिर अथवा नवग्रह मंदिरों में यज्ञ या हवन की जाती है. “ॐ शानेश्वराए नमः” के जप के साथ शनि की प्रतिमा को गंगाजल, पंचामृत, सरसों के तेल, और जल से पखारा (साफ़) किया जाता है. इस दिन व्रत रखा जाता है और शनि चालीसा का पाठ किया जाता है. इस दिन दो महत्वपूर्ण पूजा संस्कार , शनि तैलाभिशेकम और शनि शांति पूजा की जाती है. यह पूजा किसी के राशि में शनि दोष के प्रभाव को कम करती है.

ऐसा माना जाता है की इस दिन काले रंग के कपड़े, काला तिल, सरसों या तिल का तेल दान करना लाभदायक होता है.

शनि जयंती , वट सावित्री व्रत के साथ ही पड़ता है जो ज्येष्ठ अमावस्या में आता है और यह उत्तरी भारत में मनाया जाता है.

लाभ

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शनि विपत्ति, दीर्घायु, दुःख, बुढ़ापा, मृत्यु, बाधा, अनुशासन, विलंबन, जिम्मेवारी, अधिकार, नम्रता, बुद्धिमत्ता, अखंडता, और मह्ताव्कांक्षा के सूचक है. इन्हें अन्धकार के ग्रह के रूप में माना जाता है जो मनुष्य के बुरे पक्ष को नियंत्रित करते है. इन्हें विनाशक और दाता दोनों ही के रूप में देखा जाता है. जो निष्ठा भाव के साथ शनि की पूजा करते है उन्हें बाधा रहित जीवन प्राप्त होता है तथा व्यक्ति के सभी इच्छा की पूर्ति होती है.

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