सुख-समृद्धि को प्रदान करती है संकट हरण संकष्टी चतुर्थी व्रत

सुख-समृद्धि को प्रदान करती है संकट हरण संकष्टी चतुर्थी व्रत (Sukti Haran Shambhashti Chaturthi vrat provides happiness and prosperity)

सुख-समृद्धि को प्रदान करती है संकट हरण संकष्टी चतुर्थी व्रत (Sukti Haran Shambhashti Chaturthi vrat provides happiness and prosperity)

भारतीय धर्म ग्रंथों में हर माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को बड़े धूम-धाम से संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। इस दिन की गयी भगवान गणपति जी की पूजा अर्चन से गणपति जी अपने सभी भक्तों के संकटों को हर लेते हैं। संकष्टी चतुर्थी  को संकट हरण चतुर्थी भी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों व गणेश पुराण जैसे अनेकों पुराणों में इस दिन का  विशेष महत्व दिया गया है। कहा जाता है की इस दिन भगवान शिव पुत्र गणेश जी का जन्म हुआ था। धार्मिक कथाओं के अनुसार इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से सुख- समृद्धि , बल- बुद्धि और ज्ञान से सफल मार्ग की प्राप्ति होती है। जातक के ऊपर बनी बाधाओं को दूर करने और जीवन की परेशानियों को कम करने में मदद मिलती है। मन्यता है कि यदि संकष्टी चतुर्थी के दिन मंगलवार पड़ जाय तो यह दिन विशेष दिन में परिवर्तित हो जाता है और इस दिन को अंगारक संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है अक्सर यह विशेष दिन छः माह में एक बार आता है इस दिन की गयी संकष्टी चतुर्थी की पूजा का फल दश गुना बढ़ कर भक्ति में विलीन भक्त को हर कष्टों से मुक्ति मिलती है इस दिन वैदिक मन्त्रों द्वारा संकट हरण भगवान गणेश जी की षोडशोपचार विधि से पूजा अर्चन की जाती है। भगवान श्रीगणेश के इस महत्वपूर्ण व्रत का वर्णन स्वयं वासुदेव श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से किया था, इस महत्वपूर्ण दिन का उल्लेख नरसिम्हा पुराण  और भविष्य पुराण में भी भगवान  वेदव्यास जी द्वारा विरचित है। संकष्टी या संकट हरण चतुर्थी के दिन चांद की रौशनी पड़ने पर गणपति अथर्वशीस का पाठ पढ़ना बहुत शुभ माना जाता है और भगवान गणेश को प्रशन्न करने के लिए उपवास रख विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश जी के दर्शन कर और उन्हें सिन्दूर और दूर्वा अर्पित कर लड्डु का भोग लगाया जाता है भगवान गणेश जी को हरी दूब यानि दूर्वा अति प्रिय है भगवन गणेशा जी को दूर्वा चढाने से गणेश जी अपने भक्त पर प्रशन्न हो कर मनवांछित फल प्रदान करते हैं और सारे संकटो का नाश और  सुख-समृद्धि प्रदान करते है इस व्रत का उपवास चांद को देखने के बाद उपवास खोला जाता है। मान्यता है कि ऋषि भारद्वाज और माता पार्वती का पुत्र अंगारक एक महान ऋषि और भगवान गणेश जी का परम भक्त था। अंगारक ने अखंड तपस्या कर भगवान गणेश जी को प्रसन्न कर उनसे वरदान प्राप्त करना चाहा और माघ कृष्ण चतुर्थी के दिन भगवान गणेश ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उनसे मनइच्छित वरदान मांगने के लिए कहा।  और अंगारक ने हमेशा के लिए  गणेश जी  से नाम जुड़ा रहेगा  ऐसा वरदान माँगा भगवन गणपति जी ने तथास्तु बोलकर कहा की हर मंगलवार को आने वाली चतुर्थी को अंगारकी चतुर्थी के नाम जाना जायेगा। जो भी इस दिन भगवान हनुमान जी की और गणेश की पूजा करता है और उनका व्रत रखता है उसके सभी संकट खत्म हो जाते हैं।

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6 टिप्पणी

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