जानिये कब मनायी जाती है गायत्री जयंती व क्यों है सर्वोपरि गायत्री मंत्र

कब मनायी जाती है गायत्री जयंती व क्यों है सर्वोपरि गायत्री मंत्र - Gayatri Jayanti

जानिये कब मनायी जाती है गायत्री जयंती व क्यों है सर्वोपरि गायत्री मंत्र

ॐ र्भूभुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्

भारतीय हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार माँ गायत्री को भारतीय संस्कृति से जुड़ी संस्कृत–संस्कार व सभ्यता की जन्मदात्री कहा जाता हैं। वेदों की उत्पति भी माँ गायत्री से ही मानी जाती हैं। वेदों के ज्ञान से व्यक्ति को जितना पुण्य मिलता है ठीक उतना ही मात्र गायत्री मंत्र के स्मरण मात्र व समझने मात्र से ही संपूर्ण वेदों का ज्ञान व पुण्य प्राप्त होता है। शास्त्रों में प्रमाणित रूप से मिलता है कि गायत्री मंत्र क़ो वेदों का सम्पूर्ण सार माना है। माँ गायत्री को पापनाशनि भी ही कहा जाता है। देवी भागवत के अनुसार माना जाता है कि सृष्टि के आरम्भ में त्रिदेवों में ब्रह्मा जी के मुख बिंदु से गायत्री मंत्र का उद्गमन हुआ था। जिस प्रकार राजा भगीरथ ने माँ गंगा की अखण्ड तपस्या कर माँ गंगा को धरती पर अवतरित कराया ठीक उसी प्रकार महर्षि विश्वामित्र जी ने माँ गायत्री की महिमा व माँ गायत्री की अपार शक्ति को जन-जन तक अग्रसर किया।

कब मनाई जाती है गायत्री जयंती

पुराणों व धर्म ग्रन्थों के अनुसार गायत्री जयंती की तिथि को लेकर अनेकों मत मिलते हैं। और लोकमत के अनुसार गायत्री जयन्ती को मनाते हैं। कुछ स्थानों पर गंगा दशहरा और गायत्री जयंती की तिथि एक समान बताई जाती है तो कुछ इसे गंगा दशहरे से अगले दिन यानि ज्येष्ठ मास की एकादशी को मनाते हैं और कई जगह श्रावण माह की पूर्णिमा को भी गायत्री जयंती का उत्सव बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। प्रमाणित रूप से श्रावण पूर्णिमा के दिन गायत्री जयंती को अधिकतर स्थानों पर स्वीकार किया जाता है। वेद, पुराण, श्रुतियां अन्य सभी धार्मिक ग्रंथ माँ गायत्री से ही उत्पन्न हुए माने जाते हैं। वेद शास्त्र की उत्पति के कारण इन्हें वेदमाता यानि वेदों की माता भी कही जाती है, त्रिदेवों की आराध्य भी माँ गायत्री को ही कहा जाता है इसलिये माँ को देवमाता भी कहा जाता है। माना जाता है कि समस्त ज्ञान की देवी भी गायत्री हैं इस कारण ज्ञान की गंगा भी गायत्री को कहा जाता है। माँ गायत्री को ब्रह्मा की दूसरी पत्नी भी माना जाता है और मां पार्वती, सरस्वती, लक्ष्मी की अवतार भी गायत्री को कहा जाता है।

भगवान वेद व्यास जी ने अपने मुख बिंदु से कहा है कि जिस प्रकार फूलों में शहद, दूध में घी सूक्ष्म रूप में छिपा होता है ठीक उसी प्रकार चारों वेदों में गायत्री का सार छिपा है। यदि गायत्री को सिद्ध कर लिया जाये तो यह कामधेनू के समान है। जैसे माँ गंगा सभी पापों को धो कर शरीर को निर्मल बना देती है उसी प्रकार गायत्री रूपी ब्रह्म गंगा से आत्मा पवित्र हो जाती है। और व्यक्ति अपने हर पापों से मुक्त हो जाता है। यदि आप इस लेख से जुड़ी और अधिक जानकारी चाहते हैं या आप अपने भौतिकश जीवन से जुड़ी किसी भी समस्या का समाधान चाहते हैं तो नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक कर आप ज्योतिषीय समाधान भी प्राप्त कर सकते हैं।

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