क्यों भगवान हनुमान को संकटमोचन के रूप में जाना जाता है

हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है आइए जानते हैं की महाबली हनुमान के संकटमोचन नाम के पीछे क्या वजह रहीं है|

सुना होगा की जीवन में संकट कैसा भी आए, हनुमान जी के पास उसका समाधान अवश्य होता है| बता दें कि इस धरती पर ऐसा कोई भी कष्ट और ऐसी कोई पीड़ा नहीं है जिसका अंत करने में महावीर हनुमान असमर्थ रहें हों इसलिए बता दें की आपके जीवन में भी अगर बार – बार संकट आते हैं या फिर कोई भी काम पूरा नहीं हो पाता तो आपको भगवान हनुमान की उपासना जरूर करनी चाहिए|

आपको यह भी पसंद आ सकता हैं: भगवान हनुमान जीवन कथा

भगवान हनुमान के जन्म के समय एक दिन माता पार्वती फल लेकर आने के लिये हनुमान जी को आश्रम में छोड़कर चली गईं थी। उस शिशु हनुमान को बहुत तेज भूख लग रही थी तो उन्होनें उस समय उगते हुये सूर्य को फल समझ लिया और उसे पकड़ने के लिए आकाश में उड़ने लगे। और उनकी सहायता करने के लिये पवन भी बहुत तेजी से चलने लगी। दूसरी तरफ भगवान सूर्य ने उन्हें घबराया हूए शिशु समझकर अपने तेज से उन्हें जलने नहीं दिया। और जब हनुमान सूर्य को पकड़ने के लिये लपके तभी तुरंत राहु सूर्य पर ग्रहण लगाना चाहता था। हनुमानजी ने सूर्य के ऊपरी भाग में जब राहु को छू लिया तो वह भयभीत होकर वहाँ से भाग गए। 

उसने इन्द्र के पास जाकर शिकायत की देवराज आपने मुझे अपनी क्षुधा शान्त करने के साधन के रूप में सूर्य और चन्द्र दिये थे। आज अमावस्या के दिन जब मैं सूर्य को ग्रस्त करने गया तब देखा कि दूसरा राहु सूर्य को पकड़ने जा रहा है। राहु की जब इन्द्र ने बात सुनी तब बहुत इन्द्र घबरा गये और राहु को साथ लेकर सूर्य की तरफ निकल गए। साथ ही राहु को देखकर हनुमानजी सूर्य को छोड़ कर राहु की ओर झपटने लगें। जब राहु ने इन्द्र को रक्षा के लिये पुकारा तब उन्होंने हनुमानजी पर वज्रायुध से प्रहार किया जिससे वे एक पर्वत पर जा कर गिर गए साथ ही उनकी बायीं ठुड्डी मे चोट लग गई थी। हनुमान की यह दशा देखकर वायुदेव को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने उसी समय अपनी गति रोक दि थी। 

इससे संसार की कोई भी प्राणी साँस नहीं ले पा रहा था और सब दर्द से तड़पने लगे थे। तब सारे सुर, असुर, यक्ष, किन्नर आदि ब्रह्मा जी की शरण में आ गये थे। फिर ब्रह्मा जी उन सबको लेकर वायुदेव के पास चले गये थें। वे मूर्छत हनुमान जी को गोद में लेकर उदास बैठे हुए थे। जब ब्रह्माजी ने उन्हें जीवित किया तो वायुदेव ने अपनी गति का संचार करके सभी प्राणियों की दर्द से दूर किया। तब ब्रह्मा जी ने कहा कि कोई भी शस्त्र इसके अंग को हानि नहीं पहुचा सकता। उसके बाद यमदेव ने अवध्य और नीरोग रहने का आशीर्वाद दिया। यक्षराज कुबेर, विश्वकर्मा आदि देवों ने भी अमोघ वरदान दिये।

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here