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बाला साहेब के वक्त वाली बगावत नहीं.. शिवसेना का ये संकट बड़ा है, क्या इस भंवर से निकल पाएंगे उद्धव ठाकरे?

शिवसेना के खिलाफ जो इस बार बगावत हुई है वो बिल्कुल वैसे ही है जैसे कांग्रेस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ हुई। ठीक उसी तरह इस बार शिवसेना में जो बगावत हुई वो उद्धव ठाकरे और बेटे आदित्य ठाकरे के खिलाफ हुई है। एकनाथ शिंदे के साथ पहले 26 विधायक जुड़े फिर 30 हुए उसके बाद ये आंकड़ा बढ़ता चला गया।

मुंबई: महाराष्ट्र में सियासी उठापटक अभी जारी है। मगर एकनाथ शिंदे का गुट मजबूत स्थिति में हैं। एकनाथ शिंदे का दावा है कि उनके पास 49 विधायकों का समर्थन हासिल है। सीएम उद्धव ठाकरे के पास अब सरकार बचाना नहीं बल्कि पार्टी बचाना चुनौती बन गया है। ये बगावत वैसी नहीं है जब उनके पिता बाला साहेब ठाकरे के वक्त हुई थी। ये बगावत अलग है। उद्धव ठाकरे के लिए ये बहुत बड़ा घाव है जिसको वो कैसे भरते हैं, ये देखने वाली बात होगी। अगर उदाहरण की तौर पर बताया जाए तो ये बिल्कुल वैसे ही है जैसे कांग्रेस के सीनियर नेताओं ने राहुल गांधी और सोनिया गांधी के खिलाफ बगावत की।

काफी पहले ही तैयार हो चुकी थी बगावत की जमीन
आज जो भी कुछ हालात बने हैं इसकी जमीन बहुत पहले ही तैयार हो चुकी थी मगर शिवसेना नेता संजय राउत और उद्धव ठाकरे को कानों कान खबर तक नहीं हुई। दरअसल, शिवसेना इतनी ओवरकॉन्फिडेंस थी कि उसको लग रहा था कि हमारे खिलाफ ऐसा हो ही नहीं सकता। जबकि बाला साहेब ठाकरे और उद्धव ठाकरे में जमीन आसमान का फर्क है। वो बाला साहेब की शिवसेना थी और ये उद्धव की। इतनी बड़ी बगावत हो जाए और किसी को खबर नहीं हुई। जबकि एकनाथ शिंदे ने मुंबई में ही मीटिंग्स भी की होंगी। कई विधायकों से बात की होगी। लेकिन उद्धव ठाकरे सुस्त नेता साबित हुए। उनकी नाक के नीचे इतना बड़ा खेल हो गया कि सरकार ही नहीं बल्कि अब पार्टी बचाना मुश्किल हो रहा है।

ये बगावत अलग है, पहली बगावतों से
बाला साहेब के समय जब पार्टी में बगावत हुई तो उनको सम्मान मिला था। चाहे नारायण राणे हों या फिर छगन भुजबल हों। लेकिन उस वक्त की बगावत बिल्कुल अलग थी। उन्होंने कहा कि पार्टी के खिलाफ जो इस बार बगावत हुई है वो बिल्कुल वैसे ही है जैसे कांग्रेस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ हुई। ठीक उसी तरह इस बार शिवसेना में जो बगावत हुई वो उद्धव ठाकरे और बेटे आदित्य ठाकरे के खिलाफ हुई है। एकनाथ शिंदे के साथ पहले 26 विधायक जुड़े फिर 30 हुए उसके बाद ये आंकड़ा बढ़ता चला गया। आज एकनाथ शिंदे के पास 49 विधायकों का दावा है जबकि कई नेताओं ने उद्धव ठाकरे को पत्र लिखा है कि वो विचार करें। यानी की नाराजगी एक दम चरम पर है।

संजय राउत के बयान के मायने
संजय राउत का बयान जिसमें राउत ने कहा था कि अगर बागी विधायक चाहें तो हम गठबंधन से बाहर भी निकल सकते हैं, अगर इस तरह की कोई तैयारी होगी कि महाविकास अघाड़ी को छोड़कर फिर से भारतीय जनता पार्टी के साथ सरकार बनानी है तो शायद दूसरी कवायद ये करते और दूसरी तरह से सामने आते। मुझे लगता है कि ये आखिरी बार एक आखिरी प्रयास है जोकि उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाए रखने का। इसी वजह से सीएम उद्धव ठाकरे ने वर्षा बंगले को खाली करते वक्त कहा था कि कोई शिवसैनिक आए तो सही, बताए तो सही कि मैं आपको सीएम नहीं देखना चाहता हूं, मुझे कोई दिक्कत नहीं है।

सरकार गिरने के बाद का डर
उन्होंने आगे बताया कि इसके साथ ही बंगला खाली करके उन्होंने ये संदेश भी दे दिया कि कोई विधायक जो भी बागी हुए हैं वो अगर कहेंगे तो वो इस्तीफा दे देंगे। संजय राउत की कल तक भाषा दूसरी थी मगर आज उनका बॉडी लैंग्वेज बिल्कुल अलग था। वो ऐसे लग रहे थे मानों कोई हारी हुई बाजी खेल रहा हो। ये बयान पूरी तरह से हताशा में दिया गया लगता है। उन्होंने आगे बताया कि उनके इस बयान से दो बातें निकल कर सामने आती है, यानी उद्धव ठाकरे अपनी हार मान चुके हैं और दूसरा की किसी भी सूरत में हमारी सत्ता बनी रहे, दूसरा वाला कारण इस वजह से लग रहा है कि जिस तरह से संजय राउत के परिवार के संबंध हैं, उन पर मनी लॉन्ड्रिंग, ईडी का खतरा है। उनके संबंध सीधे तौर पर अंडरवर्ल्ड से ही लेकिन अंडरवर्ल्ड में जहां पर पैसा लगाया जाता है, मुंबई के कारोबार में, पैसे का जो राउंड ट्रिपिंग है उसमें इनका परिवार सीधे तौर पर शामिल या आरोपित बताया जा रहा है।

जांच के घेरे में तमाम सांसद
उनको (संजय राउत) को इस बात का भी खतरा है अगर पांच सांसद जिस पर पहले से ही ईडी की जांच जारी है और एकनाथ शिंदे वाला ग्रुप सत्ता में आ गया तो उनको उपमुख्यमंत्री या गृह मंत्री बनाया जाएगा तो उन पर गिरफ्तारी की तलवार भी लटक रही है। महाराष्ट्र ने पिछले 2.5 साल में जिस तरह से बदले की भावना में काम किया है, जैसे मान लीजिए किसी ने दिल्ली में कोई बयान दिया तो उसके खिलाफ मुकदमा मुंबई में दर्ज किया जाता है। पूरे देश में पुलिस घूमती है गिरफ्तार करने के लिए अब अगर महाराष्ट्र में सरकार बदलती है तो फिर स्थितियां बदल सकती है।

बिहार का उदाहरण
बिहार की जनता ने जैसे गठबंधन को बहुमत दिया था, उसी तरह महाराष्ट्र की जनता ने भी भाजपा-शिवसेना को बहुमत दिया था। जिसमें भाजपा को 100 से ज्यादा सीटें और शिवसेना को 55 सीटें दी थी। मगर यहां भी बिहार की तरह जनता की भावना से अलग कांग्रेस और एनसीपी को मिलाकर सरकार बना ली गई। बीजेपी हमेशा आगे की सोच रखकर चलती है। वो यहां पर भी अकेले दम चुनाव लड़ने की तैयारी में है। बीजेपी की कोशिश हमेशा रहती है कि वो अकेले दम चुनाव लड़े और सरकार बनाए। ओडिशा इसका अपवाद है, जहां पर कहा पर आपसी सहमति से काम किया जा रहा है। वहां पर बीजेपी विधानसभा चुनावों में शांत रहती है और बीजेडी लोकसभा चुनावों में। इसका सबसे बड़ा उदाहरण आपको राष्ट्रपति चुनाव में भी देखने को मिला, जहां पर एनडीए की राष्ट्रपति उम्मीदवार द्रोपदी मुर्मू को बीजेडी ने समर्थन का ऐलान किया।

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