गुरु नानक के ऐसे मुस्लिम दोस्त, जो उनके जिगरी थे और पहले शिष्य भी

एक दिन पहले गुरु नानक की पुण्यतिथि बीती है. ऐसे में उनके सबसे गहरे दोस्त के बारे में चर्चा करनी चाहिए. जिसे उनका पहला शिष्य भी कहा जाता है. वो मुस्लिम घर में पैदा हुए. नाम था भाई मरदाना. बाबा नानक जहां भी कहीं बाहर यात्राओं पर गए. भाई मरदाना हमेशा उनके साथ रहे. गुरबानी के संगीत में उनकी गहरी छाप है. कहा जाता है कि जब तक भारत का बंटवारा नहीं हुआ था, तब तक पाकिस्तान के ननकाना साहिब और करतारपुर के गुरु ग्रंथ दरबार साहिब गुरुद्वारे में गुरबानी पर संगीत की थाप उनके वंशज ही करते थे. आइए जानिए चित्रा नक्षत्र.

नानक और मरदाना एक ही गांव में पैदा हुए. ये तलवंडी में हुआ, जो अब पाकिस्तान के ननकाना साहिब में है. तब गांवों में आमतौर पर हिंदू-मुसलमानों के बीच कोई खाई नहीं थी. सब मिलजुलकर रहते थे. करीब 300-400 साल पहले हमारी सामाजिक संरचना यूं भी खासी अलग और भाईचारे वाली होती थी.

नानक और मरदाना दोनों बचपन के दोस्त थे. हालांकि मरदाना बड़े थे. ऐसे भी बचपन की दोस्ती ना तो धर्म की दीवारों को मानती है और ना ही ऊंच-नीच को. नानक बड़े और अमीर खानदान से वास्ता रखते थे तो मरदाना उस मुस्लिम मरासी परिवार से ताल्लुक रखते थे, जो गरीब थे और जिनका ताल्लुक संगीत के साजों से था.

मंत्रमुग्ध करने वाला रबाब बजाते थे

इसलिए मरदाना की संगीत पर गजब की पकड़ थी. वो गजब का रबाब बजाते थे. मंत्रमुग्ध कर देने वाला. जाने-माने सिख स्कॉलर डॉक्टर बलकार सिंह कहते हैं आमतौर पर मरासी समुदाय के लोग गाने-बजाने से ताल्लुक रखने वाले माने जाते हैं. वो पुराने जमाने में एंटरटेनर माने जाते थे. तब गायन गुरु नानक का होता था और संगीत भाई मरदाना का.

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हर यात्रा में नानक के साये की तरह साथ

दोस्ती समय के साथ गहरी होती चली गई. बाबा नानक की हर लंबी यात्रा में वो साये की तरह उनके साथ होते थे. बलकार सिंह कहते हैं, बाबा नानक और भाई मरदाना का रिश्ता दोस्ती का था और उससे भी आध्यात्मिकता की डोर से बंधा हुआ. ये ऐसी फ्रेंडशिप थी, जिसे नानक बहुत अहमियत देते थे.भाई मरदाना अक्सर नानक से कहते थे-आप भगवान के मैसेंजर हैं और मैं आपका मैसेंजर.

भाई मरदाना और नानक के संवाद की चर्चा सिख धार्मिक पुस्तकों में

नानक और मरदाना के बीच संवाद का जिक्र कई सिख धार्मिक पुस्तकों में विस्तार से है. इस पर तमाम कहानियां कही जाती हैं. जब दोनों यात्रा में होते थे. एक गांव से दूसरे गांव जा रहे होते या रात में किसी जंगल में डेरा डालते तब भाई मरदाना के पास बहुत से सवाल और जिज्ञासाएं होती थीं. जिनके जवाब बाबा नानक के पास होते थे. इनका जिक्र पुरानत जनम सखी में आता है.

हर जगह बाबा नानक के साथ गए

बाबा नानक ऐसे गुरु थे, जो लगातार लंबी लंबी यात्राएं करते रहते थे. वो मक्का, कश्मीर, तिब्बत, मणिपुर, बंगाल, रोम आदि जगहों की यात्रा पैदल ही की. साथ होते थे भाई मरदाना होते थे. दोनों कैसे एक दूसरे के करीब आए, इसको लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं. Reach out to the best Astrologer at Jyotirvid.

बगदाद में निधन हुआ तो अंतिम संस्कार बाबा नानक ने किया

यात्रा के दौरान ही बगदाद में 1534 में मरदाना बीमार पड़े. वहीं उनका निधन हो गया. वहां उनका स्मारक आज भी बगदाद रेलवे स्टेशन के पास है. डॉक्टर बलकार कहते हैं, जब मरदाना के बचने की उम्मीद खत्म हो गई तो नानक ने उनसे पूछा कि मैं तुम्हारा अंतिम संस्कार किस रीतिरिवाज से करूं तो उनका जवाब था, “मैं तो तुम्हारा हूं, जैसे भी तुम्हें लगे, तुम मेरा अंतिम संस्कार कर देना”. हालांकि नानक ने अपने दोस्त का अंतिम संस्कार मुस्लिम रीति रिवाजों से ही किया. बलकार कहते हैं, ” भाई मरदाना बेशक मुसलमान थे लेकिन जीते जी ही सिख सरीखे हो गए थे. पूरी तरह से नानक के रंग में रंग गए थे.”

भाई मरदाना के परिजन भी नानक से जुड़ गए

जब नानक वापस लौटे तो उन्होंने भाई मरदाना के परिवारवालों को उनके निधन के बारे में बताया. कहा जाता है कि इसके बाद नानक ने मरदाना के परिवार की जिम्मेदारी ली. वहीं मरदाना का बेटा शहजादा और परिवारजन उनके फॉलोअर बन गए.

अब भी उनकी पीढ़ी के वंशज गुरुद्वारों से जुड़े हैं

भाई मरदाना जी को गुरु की बाणी को 19 रागों में बांध कर गाने का हुनर हासिल था. पाकिस्तान में उनकी 18वीं पीढ़ी के वंशज अब भी हैं. डॉक्टर बलकार बताते हैं कि जब तक देश का बंटवारा नहीं हुआ था जब तक पंजाब के गुरुद्वारों में कीर्तन करने वाले उसी मरासी समुदाय के लोग होते थे, जिससे भाई मरदाना ताल्लुक रखते थे. और अन्य खबरों के लिए इस लिंक पर क्लिक करें.

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