कोरोना के साथ आपको अपने जीवन के सभी हादसों से बचना है तो आपको इन दो उपायों को अपनाने होंगे

ललित गर्गबुद्धि और विवेक किराए पर नहीं मिलते। मिल भी जाएं तो अपने काम नहीं आते। इसे स्वयं में उत्पन्न करना पड़ता है। स्वयं से उत्पन्न ज्ञान एवं विवेक से ही समस्याओं का समाधान संभव होता है। इस तरह का ज्ञान भले ही आजीविका चलाने के लिहाज से ज्यादा उपयोगी न प्रतीत हो, जीवन जीने की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। इसका अभाव न केवल व्यक्ति के लिए बल्कि कई बार संपूर्ण समाज के लिए विनाशकारी साबित होता है। आज कोरोना ने जो चारों तरफ कहर बरपा रखा है,, उसके भी मूल में देखें तो ज्ञान, विवेक एवं संयम का यही अभाव काम कर रहा है। इसका समाधान है- अनुशासन और संयम। संयम ऐसा सूत्र है, जो व्यक्तिवादी मनोवृत्ति से हटकर परमार्थ की मनोवृत्ति विकसित करता है।

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सड़कों पर स्पीडब्रेकर लगे होते हैं। अगर ये न हों तो दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है। संयम और अनुशासन जीवन में इसी स्पीडब्रेकर की भूमिका निभाते हैं। ये अनियमितता, अनुशासनहीनता एवं अनियंत्रित जीवनशैली की रफ्तार को कम कर देते हैं। तेज रफ्तार न सड़क पर अच्छी होती है और न जीवन में । दुर्घटना की संभावना दोनों में है और विशेषतः कोरोना संक्रमण के इस दौर में तो और भी अधिक है। बढ़ती महत्वाकांक्षा और उग्रता आदमी को अशांत एवं बीमार बना रही है। आज का आदमी विराम को मान्य नहीं करता। कोरोना की समस्या का समाधान सिर्फ अध्यात्म के पास है और वह है त्याग और संयम। आचार्य तुलसी ने ‘संयम ही जीवन है’ का उद्घोष किया, जो भौतिकवादी समस्याओं का समाधान है।

आज त्याग एवं संयम का संस्कार है कहां? सारा संस्कार तो भोग का है। हम अपने जीवन में संयम के संस्कार पैदा करें। इच्छा को रोकने और छोड़ने की क्षमता पैदा करें। जीवन में व्रतों को महत्व दें, उन्हें स्वीकार कर अपने रेजिस्टेंस पावर को मजबूत बनाएं। त्याग, संयम और व्रत- ये हमें अति भौतिकता के वायरस से बचाने वाली एंटीबॉडी का काम करते हैं। कोरोना से बचाव के लिए सोशल डिस्टेंसिंग को अनिवार्य बताया जा रहा है। कहा जाता है कि आइसोलेशन यानी अकेलापन और एकांत (क्वारंटीन) को सहन करने की हमें आदत डालनी चाहिए। अध्यात्म हमें पहले से ही इसे अपनाने की सलाह देता रहा है। अध्यात्म साधना के लिए एकांत आवश्यक होता है।

सुविधाओं की कमी बर्दाश्त करना और असुविधाओं की आदत डालना एक ऐसी उपलब्धि हो सकती है जो आगे भी काम आती रहेगी। सुविधावाद बीमारी का जनक है। सुविधावाद आदमी को एबनॉर्मल बनाता है। कठिनाइयां जीवन को हौसला प्रदान करती हैं। जॉन हॉमर मिलर के अनुसार- चिंता से भागकर कभी नहीं बच सकते, परंतु यदि उसके प्रति स्वयं की मानसिकता को बदला जाए तो चिंता को दूर भगाया जा सकता है।

त्याग और संयम का मूल्यांकन करें और इसे एक प्रतिरोधक शक्ति के रूप में स्वीकार करें। समस्या महामारी की हो, पदार्थ की हो, शरीर की हो या मन की, वह केवल औषधोपचार से समाप्त नहीं होगी। औषधि से उसका शमन हो सकता है, किंतु वह नष्ट या समाप्त होगी तो आध्यात्मिक औषधि से ही होगी। समस्याओं का कभी अंत नहीं होता। वे अतीत में रही हैं, वर्तमान में हैं और भविष्य में भी रहेंगी। उनके समाधान के लिए जरूरी है कि हम संयमप्रधान जीवनशैली और अध्यात्मप्रधान दृष्टिकोण को अपनाएं।