40 साल बाद जल से निकलते हैं भगवान विष्णु, भाग्यशाली लोग ही कर सकते 2 बार दर्शन…

भगवान विष्णु

भारत में आपने कई चमत्कारी और अजीबोगरीब मंदिरों के बारे में सुना होगा। लेकिन एक मंदिर ऐसा भी है, जहां भगवान दस-बीस साल नहीं पूरे चालीस साल बाद दर्शन देते हैं। यह मंदिर दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य के कांचीपुरम में स्थित है, इस मंदिर का नाम देवाराजस्वामी मंदिर है। इस मंदिर में भगवान विष्णु की पूजा अथि वरदर के रूप में की जाती है। मान्यता है कि अथि वरदार भगवान विष्णु की मूर्ति की स्थापना खुद ब्रम्हाजी ने की थी।

40 साल बाद हो रहे भगवान के दर्शन इस मंदिर में स्थित भगवान वरदार की खास बात है कि यह 40 साल बाद भक्तों को दर्शन देते हैं। 1 जुलाई से 17 अगस्त तक यहां भगवान के दर्शन भक्तों को प्राप्त होंगे। मंदिर की परंपरा के अनुसार एक महीने तक भगवान शयन मुद्रा में रहते हैं। इसके बाद भगवान खड़े होकर श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं। इसी परंपरा के अनुसार 1 अगस्त से भगवान वरदार खड़े होकर भक्तों को दर्शन दे रहे हैं। 18 अगस्त से भगवान फिर से जल में प्रवेश कर जाएंगे और भक्तों को अगले 40 साल तक इनके दर्शन का इंतजार करना होगा। इससे पहले भगवान 1979 में जल से बाहर आए थे।

भाग्यशाली ही कर पाते जीवन में 2 बार दर्शन आप किसी भी मंदिर के दर्शन जीवन में कई बार कर सकते हैं लेकिन वरदार ही एक मात्र देवता हैं जिनके दर्शन बड़े से बड़े भाग्यशाली लोग भी पूरे जीवन में महज दो बार ही कर सकते हैं। सामान्य तौर पर मनुष्य की औसत आयु 65 से 70 साल होती है। बहुत कम लोग ही 80 साल या उससे अधित जीवित रह पाते हैं। वरदार के दर्शन के इसी महत्व के कारण हर दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा हुआ है।

ब्रह्माजी और माता सरस्वती का मनमुटाव भगवान वरदार के प्राकट्य की एक रोचक कथा प्रचलित है। मंदिर के पास वेगवती नाम की नदी बहती है। धार्मिक मान्यता है कि देवी सरस्वती ही यहां नदी रूप में प्रवाहित होती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता सरस्वती कांचीपुरम (पुराणों में कांचीपुरम का नाम हस्तगिरी बताया गया है) में ब्रह्माजी से रुष्ट होकर वेगवती नदी के रूप में बहने लगीं। जहां नदी बह रही थी, वहां अंजीर के घने जंगल हुआ करते थे। नाराज सरस्वती को मनाने के लिए ब्रह्माजी ने यज्ञ का अनुष्ठान किया।

विश्वकर्माजी ने किया प्रतिमा का निर्माण यज्ञ की जगह को नष्ट करने के लिए नाराज सरस्वती वेगवती की धारा को लेकर बड़ी वेग से आईं। यज्ञ की रक्षा के लिए वेदी की अग्नि से भगवान विष्णु वरदार के रुप में प्रकट हुए और देवी सरस्वती का क्रोध शांत किया। ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु के प्रति आभार प्रकट करने के लिए भगवान की एक प्रतिमा बनाने का अनुरोध किया। विश्वकर्माजी ने अथि यानी अंजीर की लकड़ियों से वरदार भगवान की मूर्ति का निर्माण किया और ब्रह्माजी ने इनकी प्रतिष्ठा की।

देवगुरु बृहस्पति करते हैं तालाब के अंदर पूजा भगवान की जल समाधि के पीछे कई कथाएं हैं। एक कथा के अनुसार यज्ञ की अग्नि से प्रकट होने के कारण भगवान का शरीर काफी तप रहा था। भगवान की तपिश को कम करने के लिए उन्हें जल में प्रवेश करा दिया गया। मान्यता है कि जब तक भगवान जल में रहते हैं तब तक देवगुरु बृहस्पति इनकी पूजा करते हैं।

भगवान के जल समाधि की दूसरी प्रचलित कथा दूसरी मान्यता है कि मुगल काल में भगवान की प्रतिमा की रक्षा के लिए इनको जल में छुपा दिया गया। 40 साल बाद मंदिर के पुजारी ने मूर्ति को जल से निकलवाकर उनकी पूजा की। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से 48 दिनों बाद मूर्ति फिर से जल में प्रवेश कर गई। इसके बाद से यह परंपरा बन गई कि 40 साल बाद मूर्ति कुंड से निकलती है और फिर 48 दिनों के उत्सव के बाद इन्हें जल में प्रवेश करा दिया जाता है।