मासिक व्रत त्‍योहार: अप्रैल में पड़ रहे हैं बहुत से प्रमुख त्‍योहार, जानते है इन त्योहार की तिथि और महत्‍व

अप्रैल महीने के ये हैं प्रमुख व्रत त्योहार

व्रत-त्‍योहार की दृष्टि से अप्रैल माह व‍िशेष है। इस माह में कई व्रत-त्‍योहार पड़ रहे हैं। यान‍ि कि पूरा माह ईश्‍वर की आराधना-उपासना में बीतेगा। आइए जानते हैं अप्रैल माह में पड़ने वाले प्रमुख व्रत-त्‍योहारों की तिथ‍ि और उनका महत्व।

दुर्गाष्टमी (1 अप्रैल )

वैसे तो हर महीने ही शुक्ल पक्ष की अष्टमी को दुर्गा अष्टमी व्रत का विधान है लेकिन नवरात्र के दौरान आने वाली अष्टमी को महाअष्टमी के नाम से जाना जाता है। इस दिन मां दुर्गा का विशेष पूजन, अर्चन और स्तवन किया जाता है। अनेक घरों में अष्टमी का पूजन कर नवरात्र का समापन कर लिया जाता है और कुछ घरों में नवमी के दिन ऐसा किया जाता है। इस दिन मां दुर्गा की पूजा के बाद उन्हें चने और हलवा-पूरी का भोग लगाया जाता है। देशभर में अलग-अलग जगहों पर स्थापित शक्तिपीठों में इस दिन विशेष पूजा का आयोजन कर उत्सव मनाया जाता है। माना जाता है कि मां दुर्गा के पूजन से उपासकों को विशेष शक्ति मिलती है और उनकी समस्त मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। इस दिन कंजक पूजन कर सामान्यतया दस वर्ष तक की छोटी बालिकाओं को प्रसाद के रूप में हलवा-पूरी खिलाया जाता है।

रामनवमी (2 अप्रैल)

भगवान राम के जन्मदिन के रूप में रामनवमी का पर्व पूरे देश में मनाया जाता है। उनका जन्म चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र में और कर्क लग्न में अयोध्या में राजा दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या की कोख से हुआ था। इस दिन पूरे देश में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और भगवान राम की विधि विधान से पूजा की जाती है। इस दिन हजारों लोग अयोध्या पहुंचकर पुण्य सलिला सरयू नदी में स्नान कर पुण्यार्जन करते हैं। इस पर्व का संबंध राम से होने के कारण इस दिन को अत्यन्त शुभ माना जाता है। इसी दिन अयोध्या में चैत्र राम मेले का भव्य आयोजन भी किया जाता है। रामनवमी के दिन असंख्य लोग रामनाम का स्मरण करते हुए व्रत रखते हैं। मान्यता है कि इस व्रत से व्रती की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

कामदा एकादशी (4 अप्रैल)

चैत्र शुक्ल एकादशी को कामदा एकादशी के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखकर भगवान नारायण का पूजन, अर्चन और स्तवन करने से वे प्रसन्न होते हैं और उपासक को सभी पापों से मुक्त कर देते हैं। प्राचीन काल में राजा दिलीप ने भी इस एकादशी के व्रत का माहात्म्य अपने गुरु वशिष्ठ से सुना था। गुरु ने उन्हें बताया था कि एक बार राजा पुंडरीक किसी के श्राप से मनुष्य से राक्षस बन गया था। उस राजा की पत्नी ने चैत्र एकादशी का व्रत रखकर भगवान नारायण से प्रार्थना की थी कि मेरे इस व्रत का फल मेरे पति को प्राप्त हो जाये। भगवान नारायण ने पत्नी के व्रत का फल उसके राक्षस बन चुके पति राजा पुंडरीक को दे दिया। जिससे वह राक्षस से एक बार फिर से राजा बन गया। इस व्रत के विषय में यह भी कहा जाता है कि इस व्रत को रखने से उपासक ब्रह्म हत्या जैसे पापों से और पिशाच योनि से भी मुक्त हो जाता है।

प्रदोष व्रत (5 अप्रैल शुक्‍ल पक्ष और 20 अप्रैल कृष्‍ण पक्ष)

भगवान शिव को अत्‍यंत प्रिय प्रदोष व्रत अत्‍यंत शुभ एवं महत्‍वपूर्ण होता है। यह व्रत शुक्‍ल पक्ष और कृष्‍ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन रखा जाता है। पूजन संध्‍याकाल में किया जाता है। व्रती को सफेद या फिर हल्‍के रंग के वस्‍त्र धारण करने चाहिए। भगवान शिव के मंदिर जाकर श‍िवलिंग का अभिषेक करना चाहिए। इसके बाद पंचाक्षरी मंत्र का जप करना चाहिए। भगवान शिव को बेल पत्र चढ़ाकर प्रदोष कथा पढ़कर आरती करें। साथ ही भोलेनाथ को अपनी मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करें। इसके बाद भगवान शिव को भोग लगाकर सभी को व‍ितर‍ित करें और स्‍वयं भी ग्रहण करें।

गुड फ्राईडे (10 अप्रैल)

गुड फ्राइडे को होली फ्राइडे, ब्लैक फ्राइडे या ग्रेट फ्राइडे भी कहते हैं। यह ईसाई धर्म के लोगों द्वारा कैलवरी में ईसा मसीह को सलीब पर चढ़ाने के कारण हुई मृत्यु की तिथ‍ि के रूप में मनाया है। यह पवित्र सप्ताह के दौरान मनाया जाता है, जो ईस्टर संडे से पहले पड़ने वाले शुक्रवार को आता है और इसका पालन पाश्कल ट्रीडम के अंश के तौर पर किया जाता है। बता दें कि यह अक्सर यहूदियों के पासोवर के साथ पड़ता है।

श्री पंचमी (10 अप्रैल)

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को लक्ष्मी पंचमी के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि धन की अधिष्ठात्री देवी मां लक्ष्मी का पूजन और व्रत इस दिन विशेष फलदायी होता है और लक्ष्मी मां की स्तुति सभी लक्ष्मी स्तोत्रों के द्वारा करनी चाहिये। इस दिन व्रत रखने वाले साधकों को लक्ष्मी स्तोत्र, लक्ष्मी सूक्त, देव्यपराधक्षमा स्तोत्र, कनक धारा स्तोत्र आदि से पूरा दिन महालक्ष्मी का स्तवन करना चाहिए। सायंकाल में विशेष पूजन कर निर्धनों को दान आदि देना चाहिए।

मेष संक्रांति (13 अप्रैल)

मेष संक्रांति (जिसे मेष संक्रमण भी कहा जाता है) सौर चक्र वर्ष के पहले दिन को संदर्भित करता है, जो कि हिंदू लूणी-सौर कैलेंडर में सौर नव वर्ष होता है। बता दें कि प्राचीन ग्रंथों के अनुसार इस दिन सूर्य एक विशिष्ट तरह का संक्रमण करता है। मेष संक्रांति भारतीय कैलेंडर की बारह संक्रांतियों में से एक है। यह अवधारणा भारतीय ज्योतिष ग्रंथों में भी पाई जाती है, जिसमें यह मेष राशि में सूर्य के संक्रमण के दिन को संदर्भित करती है। यह संक्रांति आमतौर पर 13 अप्रैल और कभी-कभी 14 अप्रैल को पड़ती है। यह दिन प्रमुख हिंदू, सिख और बौद्ध त्योहारों का आधार है, जिनमें से वैशाखी और वेसक सबसे प्रसिद्ध हैं।

संत कंवरराम जयंती (13 अप्रैल)

संत कंवर रामजी का जन्म 13 अप्रैल सन् 1885 ईस्वी को बैसाखी के दिन सिंध प्रांत में सक्खर जिले के मीरपुर माथेलो तहसील के जरवार ग्राम में हुआ था। उनके पिता ताराचंद और माता तीर्थ बाई दोनों ही प्रभु भक्ति एवं हरि कीर्तन में अपना द‍िन व्‍यतीत करते थे। इसके अलावा उनकी एक छोटी सी दुकान थी। कहते हैं कि उनके जीवन में संतान का अभाव था। सिंध के परम संत खोतराम साहिब के आशीर्वाद से उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम ‘कंवर’ रखा गया। कंवर का अर्थ है ‘कंवल’ अर्थात कमल का फूल। नामकरण के समय संत खोताराम साहिब ने भविष्यवाणी की कि जिस प्रकार कमल का फूल तालाब के पानी और कीचड़ में खिलकर दमकता रहता है वैसे ही इस जगत में ‘कंवर’ भी निर्मल, विरक्त होगा और सारे विश्व को कर्तव्य पथ, कर्म, त्याग और बलिदान का मार्ग दिखाएगा।

डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती (14 अप्रैल)

डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती को बतौर पर्व मनाया जाता है। इस द‍िन को ‘समानता दिवस’ और ‘ज्ञान दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है। बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर को पूरे विश्‍व में उनके मानवाधिकार आंदोलन, संविधान निर्माण और उनकी प्रकांड विद्वता के लिए जाना जाता है। 14 अप्रैल को उनकी जयंती के दिन को उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। पहली बार बाबा साहेब की जयंती 14 अप्रैल 1927 को उनके अनुयायी रणप‍िसे ने पुणे में मनाई थी। इसके बाद से ही बाबा साहेब की जयंती की प्रथा का आरंभ माना जाता है।

वरुथिनी एकादशी (18 अप्रैल)

हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का अत्यंत महत्व बताया गया है। एकादशी पर उपवास रखने की भी परंपरा है। एकादशी का व्रत मोक्षदायक माना जाता है। हर माह में दो एकादशी पड़ती हैं, दोनों ही एकादशी की पद्म पुराण में बड़ा महत्व बताया गया है। इस पुराण में वैशाख मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि यमराज और यमलोक के भय से परेशान लोगों को वरूथिनी एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस एकादशी के व्रत से राजा मानधाता और धुन्धुमार स्वर्ग को गए। इस वर्ष यह एकादशी 18 अप्रैल को है। इस दिन भगवान नारायण के वराह अवतार की पूजा भी किए जाने का विधान है। पुराण में कहा कहा गया है कि इस व्रत को रखने से समस्त पाप व ताप नष्ट होते हैं।

गुरु अनंग देव जयंती (24 अप्रैल)

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन अनंग त्रयोदशी के व्रत का विधान है। जिसका अंग न हो उसे अनंग कहा जाता है। और संस्कृत साहित्य में कामदेव को अनंग के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान महादेव ने कामदेव को अपने तप से भस्म कर दिया तो उसने बिना अंग के ही सब प्राणियों में अपना वास बना लिया। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से पति और पत्नी में अनुराग उत्पन्न होता है और उन्हें पुत्र के रूप में संतति सुख प्राप्त होता है। भविष्य पुराण में इस व्रत के विषय में कहा गया है कि इस दिन कामदेव और रति का पूजन करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।

अक्षय तृतीया, भगवान परशुराम जयंती (26 अप्रैल)

बैसाख की शुक्‍ल पक्ष तृतीया को अक्षय तृतीया मनाई जाती है। इस बार यह तिथि 26 अप्रैल को है। कहा जाता है कि इस दिन जो भी काम किया जाए उसका कई गुना फल मिलता है और वह कभी घटता भी नहीं है। मान्‍यता यह भी है कि इसी दिन से सतयुग और त्रेता युग का आरंभ हुआ था। नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार भी इसी दिन हुआ था। अक्षय तृतीया पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजा का विशेष महत्त्व है। इस दिन पूजन को विशेष लाभदायी माना जाता है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है। इस दिन धन संचय करते हैं। सोने-चांदी के आभूषण आदि की खरीदारी की परंपरा है। इसके अलावा इस दिन बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद प्राप्त करके नए कार्य का शुभारंभ करना चाहिए।

विनायक चतुर्थी व्रत (27 अप्रैल)

प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार प्रत्येक चंद्र मास में दो चतुर्थी होती हैं। यह चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित होती है। अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को ही विनायक चतुर्थी कहते हैं और पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन गणेशजी का व्रत रखने वाले के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। साथ ही वर्ष भर श्री गणेशजी की कृपा बनी रहती है।

आद्य शंकराचार्य जयंती (28 अप्रैल)

एक नन्‍हें से बालक के महज 2 वर्ष में वेद, उपनिषद के ज्ञान और 7 वर्ष में संन्‍यास जीवन में प्रवेश कर जाने की बात निश्‍चय ही हैरान कर देती है। लेकिन कहते हैं न कि हर सफल पुरुष के पीछे किसी न किसी स्‍त्री का हाथ होता है तो बालक ‘शंकर’ के जगद्गुरु आदि शंकराचार्य बनने के पीछे भी एक स्‍त्री यानी कि उनकी मां को ही श्रेय जाता है। यह उनकी महानता ही थी कि बरसों बाद जन्‍में एक मात्र पुत्र को उन्‍होंने न केवल शिक्षा दी बल्कि उसके जगद्गुरु बनने का मार्ग भी प्रशस्‍त कर दिया। बता दें कि इस बार जगद्गुरु शंकराचार्य की जयंती 28 अप्रैल को है। शंकराचार्य का जन्‍म केरल के कालड़ी गांव में ब्राह्मण दंपत्ति शिवगुरु नामपुद्रि और विशिष्‍टा देवी के घर में भोलेनाथ की कृपा से हुआ था। इस संबंध में कथा मिलती है कि शिवगुरु ने अपनी पत्‍नी के साथ पुत्र प्राप्ति के लिए शिवजी की आराधना की। इसके बाद शिवजी ने प्रसन्‍न होकर उन्‍हें एक पुत्र का वरदान दिया लेकिन यह शर्त रखी कि पुत्र सर्वज्ञ होगा तो अल्‍पायु होगा। यदि दीर्घायु पुत्र की कामना है तो वह सर्वज्ञ नहीं होगा। इसपर शिवगुरु ने अल्‍पायु सर्वज्ञ पुत्र का वरदान मांगा। इसके बाद भोलेनाथ ने स्‍वयं ही उनके घर पर जन्‍म लेने का आर्शीवाद दिया। इस तरह वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन आदि गुरु का जन्‍म हुआ और उनका नाम शंकर रखा गया।

रामानुजाचार्य जयंती (29 अप्रैल)

भारत की भूमि ने कई महान संत और महात्माओं को जन्म दिया है। रामानुज का जन्म 1017 ईसवी सन् में दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन में उन्होंने कांची जाकर अपने गुरू यादव प्रकाश से वेदों की शिक्षा ली। उन्होंने कई लोगों को धर्म के राह में जोड़ा है और उन्हें मुक्ति दी है। वैष्णव आचार्यों में प्रमुख रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में ही रामानन्द हुए जिनके शिष्य कबीर और सूरदास थे।

चित्रगुप्‍त जयंती, गंगा सप्‍तमी (30 अप्रैल)

हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियां होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। यम द्वितीया के दिन ही यह त्यौहार भी मनाया जाता है। यह खासकर कायस्थ वर्ग में अधिक प्रचलित है। भगवान च‍ित्रगुप्‍त उनके आराध्‍य देवता हैं। भगवान चित्रगुप्त परमपिता ब्रह्मा जी के अंश से उत्पन्न हुए हैं और यमराज के सहयोगी हैं। च‍ित्रगुप्‍त जी का जन्‍म ब्रह्मा जी की काया से हुआ था। कहा जाता है कि इसीलिए ये कायस्थ कहलाये और इनका नाम चित्रगुप्त पड़ा। वहीं आस्था की प्रतीक गंगा नदी के पृथ्‍वी पर आने की तिथ‍ि को गंगा सप्‍तमी के रूप में मनाया जाता है। मान्‍यता है कि वैशाख मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को ही मां गंगा स्वर्ग लोक से भगवान भोलेनाथ की जटाओं में पहुंची थीं। कहा जाता है कि गंगा सप्तमी के दिन गंगा स्नान करने से सभी तरह के पाप और सभी दुखों से मुक्ति मिल जाती है।