अध्यात्म की राह पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहा महामारी

मनुष्य का जीवन तथा व्यक्तित्व चार बातों से प्रभावित होता है। पहली बात, दुनिया का शासन तंत्र। दूसरी, दुनिया के व्यापारियों के सिद्धांत। तीसरी, इन दो जीवन-कारकों से निर्मित परिवेश और परिस्थितियां। चौथी बात, व्यक्ति का आत्मप्रेरणा से उक्त तीनों बातों पर किया गया मौलिक चिंतन। अध्यात्म में चौथी बात महत्वपूर्ण है। जब मनुष्य किसी कारण आध्यात्मिकता से विमुख होता है तो उसके दिन-रात बड़ी विचित्र भावनाओं के साथ व्यतीत होते हैं। आजकल कोरोना महामारी के कारण मनुष्य दुविधा, संदेह और आशंकाओं के भंवर में फंसा हुआ है। ऐसे में आत्मसंयम के लिए साधना परमावश्यक है। साधना के लिए अवगुणों, सामान्य मानुषिक प्रवृत्तियों और मनोरंजक चित्त वृत्तियों से मुक्ति आवश्यक है।

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माना कि मनुष्य इतनी आसानी से अवगुणों का त्याग नहीं कर सकता, परंतु अवगुण भी उसके मन-मस्तिष्क में एक संवेदना, न्याय दृष्टि और करुणा-विधान के साथ विद्यमान रहने चाहिए। कहने का अर्थ यह है कि यदि कोई मनुष्य जीवन परिस्थितियों में फंसने के कारण काम, क्रोध, मोह, लालच और ईर्ष्या जैसे अवगुणों को धारण करता भी है, तो उसके मनोविज्ञान एवं आत्मज्ञान में इनका आध्यात्मिक दृष्टि के साथ निरंतर एक मौलिक विश्लेषण होता रहना चाहिए। जब यह विश्लेषण प्रक्रिया चलेगी तो मनुष्य ये अवश्य सोचेगा कि वह मानुषिक दुर्गुणों के प्रभाव में आया ही क्यों। उसके दिमाग में ये बात भी आएगी कि इन दुर्गुणों का मनुष्य के जीवन में अस्तित्व बना ही क्यों, इन्हें स्थापित और विकसित किया ही क्यों गया। आत्मचिंतन की यह दशा मानव को अपने दुर्गुणों के संबंध में प्रशांत चिंतन-मनन करने की सुविधा प्रदान करती है।

इस अवस्था में मनुष्य के मन में एक बात और उठती है, जो उसे तीव्र गति से विचलित करती है कि संसार में जितनी भी मानवीय गतिविधियां जिस रूप में भी हैं, वास्तव में उनका मौलिक व अंतिम लक्ष्य कुछ नहीं। ऐसी गतिविधियां मनुष्यों को केवल समाज, व्यवसाय और राजकाज में एक दैनिक अनुशासन से बांधने के लिए नियत हैं। ऐसी गतिविधियों का निर्धारण संवेदनशील मनुष्य की आध्यात्मिक समझ की सहमति के साथ नहीं किया जाता। ऐसे में जिस मनुष्य के अंतःस्थल में जीवन के इस प्रकार के अनुशासन के विरोधाभासों के प्रति बेचैनी बढ़ती जाती है, उसके सामने सच्चे सुख और शांति का मार्ग स्पष्ट होने लगता है। ऐसा मार्ग जिस पर वह स्वप्रेरणा से चलना चाहता है। यह है अध्यात्म का मार्ग।

अध्यात्म की पवित्र ज्योति में जीवन संबंधी तमाम समस्याओं के संदर्भ नए-नए अर्थों, अपरिभाषित व्याख्याओं और सरल परिभाषाओं के रूप में प्रकट होते हैं। इसी से मनुष्य खुद को ढंग से समझ पाता है। उसे पता चलता है कि प्राकृतिक जीवन का अंतिम लक्ष्य आधुनिकता की अनेक छिद्रयुक्त नावों पर बैठ यात्रा कर दुर्घटनाग्रस्त होने के लिए नहीं, अपितु सहज-सरज प्राकृतिक जीवन जीने के लिए है।

विषाणुजनित महामारी का यह समय हमें चिंता और असुरक्षा के सागर में धकेल सकता है तो अध्यात्म की राह पर आगे बढ़ने की प्रेरणा भी बन सकता है। मनुष्य जाति ये मानकर चले कि महामारी से मुक्ति के बाद विश्व पहले वाली जीवन-स्थितियों में नहीं रहेगा। इसलिए संभावित नई जीवन-स्थितियों को धैर्यपूर्वक आत्मसात करने के लिए मनुष्य को अपना आत्मसंयम निरंतर बढ़ाना होगा। यही संयम अध्यात्म की नई राह पर मार्गदर्शक भी होता है।