श्राप के कारण और कहीं नहीं होती ब्रह्माजी की पूजा, कार्तिक एकादशी पर विराजते हैं देवता

सनातन धर्म के अनुसार तीन प्रधान देव माने जाते है, ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ब्रह्मा जी ने इस जगत की रचना की, विष्णुजी इस जगत का पालन करते है और महेश यानि भगवान शिव संहारक है। राजस्थान के पुष्कर जिले में विश्व प्रसिद्द जगत के सृष्टि रचियता ब्रह्माजी का मंदिर है जो भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। पुष्कर की रचना कैसे हुई इस विषय में पद्मपुराण समेत कई प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख मिलता है।

कमल के पुष्प से बना पुष्कर

पुष्कर का अर्थ है एक ऐसा सरोवर जिसकी रचना पुष्प से हुई हो। शास्त्रों के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी ने पृथ्वी पर यज्ञ करने की इच्छा प्रकट की थी उस वक्त धरती पर वज्रनाभ नामक राक्षस का आंतक फैला हुआ था। वह बच्चों को जन्म लेते ही मार देता था। ब्रह्माजी ने कमल के पुष्प से प्रहार कर इस दैत्य का वध कर दिया। यह पुष्प धरती पर उछलकर तीन जगह गिरा। तीनों ही स्थान पर जलधारा बहने लगी तथा सरोवर की उत्पत्ति हुई। ये तीनों सरोवर ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर, कनिष्ठ पुष्कर के नाम से प्रसिद्ध हुए। ज्येष्ठ पुष्कर में ब्रह्माजी ने यज्ञ किया, जिससे इस सरोवर को आदि तीर्थ होने का गौरव मिला।

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डुबकी लगाने से मिलता है पुण्य

ब्रह्माजी ने पुष्कर सरोवर में कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक यज्ञ किया तभी से पुष्कर में पांच दिनों का धार्मिक मेला आयोजित होता आ रहा है। पौराणिक मान्यता है कि इन पांच दिनों के दौरान सभी देवी-देवता अंतरिक्ष से उतरकर पुष्कर में प्रवास करते है। ऐसी मान्यता है कि इस माह सरोवर में स्नान करने से पूरे एक साल के स्नान के बराबर पुण्य मिलता है तथा आखिरी पांच दिनों के दौरान ब्रह्मा जी समेत सभी 33 कोटि देवी- देवता पुष्कर में ही विद्यमान रहते है। सरोवर में डुबकी लगाने मात्र से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लाखों तीर्थ यात्री पुष्कर आते हैं, पवित्र पुष्कर सरोवर में स्नान कर ब्रह्मा जी के मंदिर में पूजा करते हैं दीपदान करते हैं।

अमृत कलश से गिरी थी बूँदें

एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन से निकले अमृतघट को छीनकर जब एक राक्षस भाग रहा था तब उसमें से कुछ बूंदें इसी सरोवर में गिर गई तभी से यहाँ के पवित्र सरोवर का पानी अमृत के समान स्वास्थ्यवर्धक हो गया जिसकी महिमा एवं रोगनाशक शक्ति के बारे में इतिहास में अनेकों उदाहरण भरे पड़े है।

श्राप के कारण और कहीं नहीं होती है पूजा

हमारे देश में जहां भगवान विष्णु और शिव के इतने मन्दिर है, पर ब्रह्माजी के मंदिर क्यों नहीं? इसकी वजह है खुद ब्रह्माजी की पत्नी सरस्वती का श्राप। पुराणों के अनुसार एक बार ब्रह्माजी के मन में धरती की भलाई के लिए यज्ञ करने का ख्याल आया। यह यज्ञ वह सबसे शुभ समय पर करना चाहते थे। किन्तु उनकी पत्नी सरस्वती जिनका यज्ञ के समय रहना आवश्यक था, ने उन्हें इंतजार करने को कहा, काफी देर तक इंतजार करने के बाद भी जब सरस्वती यज्ञ स्थल पर नहीं पहुँची, तब ब्रह्माजी ने वही एक स्थानीय ग्वाल बाला से विवाह रचाया और यज्ञ में बैठ गए।

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सरस्वती थोड़ी देर से पहुंची। लेकिन यज्ञ में अपनी जगह पर किसी और स्त्री को देखकर वह क्रोधित हो गई। उन्होंने ब्रह्माजी को श्राप दिया कि आज से इस पृथ्वी लोक में तुम्हारी कहीं पूजा नहीं होगी। पृथ्वीवासी तुम्हें भूल जाएंगे। सरस्वती के इस रूप को देखकर सभी देवता डर गए। उन्होंने उनसे विनती की कि अपना श्राप वापिस ले लीजिए, लेकिन वो नहीं मानी। जब गुस्सा ठंडा हुआ तो सरस्वती ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में ही आपकी पूजा होगी। कोई भी दूसरा मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा। ब्रह्मा जी वो देवता है जिनके चार हाथ हैं। इन चारों हाथों में आपको चार किताबें देखने को मिलती है। ये चारों किताब चार वेद हैं, वेद का मतलब ज्ञान होता है, पद्म पुराण में कहा गया है कि ब्रह्मा इस स्थान पर दस हजार साल रहे थे, इन सालों में उन्होंने पूरी सृष्टि की रचना की थी, जिन पाँच दिनो में ब्रह्माजी ने यहाँ यज्ञ किया था वो कार्तिक महीने की एकादशी से पूर्णिमा तक का वक्त था, हर साल इसी महीने में यहाँ इस मेले का आयोजन होता है, हर साल एक विशेष गूंज कार्तिक के इन दिनों में यहाँ सरोवर के आस-पास सुनाई पड़ती है जिसकी पहचान कुछ आध्यात्मिक गुरूओं को है । ये शक्तियां उस ब्रह्मा की उपासना के लिए आती हैं जिनकी वजह से इस दुनिया का वजूद है इस दौरान सरोवर के पानी में एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति का जिक्र है जिससे सारे रोग दूर हो जाते हैं। अन्य खबरों के लिए इस लिंक पर क्लिक करें.

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