देवशयनी एकादशी: 4 महीने नहीं होंगे अब ये जरूरी काम, सोने जा रहे हैं भगवान

सनातन धर्म में देवशयनी एकादशी का महत्‍व

सनातन धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशी होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी कहा जाता है। कहीं-कहीं इस तिथि को ‘पद्मनाभा’ भी कहते हैं। बता दें क‍ि सूर्य के मिथुन राशि में आने पर ये एकादशी आती है। इसी दिन से चातुर्मास की शुरुआत मानी जाती है। मान्‍यता है इस दिन से भगवान श्रीविष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और फिर लगभग चार माह बाद तुला राशि में सूर्य के जाने पर भगवान को उठाया जाता है। इस बीच के अंतराल को ही चातुर्मास कहा गया है।

1 जुलाई को है देवशयनी एकादशी

हिंदू कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह एकादशी हर साल जुलाई महीने में आती है। इस बार देवशयनी एकादशी 1 जुलाई यानी क‍ि बुधवार को है। एकादशी तिथि 30 जून को शाम 07 बजकर 49 म‍िनट पर शुरू होगी।

पुराणों में वर्णित देवशयनी एकादशी

पुराणों में वर्णन आता है कि भगवान विष्णु इस दिन से चार मासपर्यंत (चातुर्मास) पाताल में राजा बलि के द्वार पर निवास करके कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते हैं। इसी प्रयोजन से इस दिन को ‘देवशयनी’ तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं। इस काल में यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह, दीक्षाग्रहण, यज्ञ, गृहप्रवेश, गोदान, प्रतिष्ठा एवं जितने भी शुभ कर्म है, वे सभी त्याज्य होते हैं। यानी क‍ि जब तक भगवान व‍िष्‍णु निद्रा से नहीं जागते तब तक कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है।

इसलिए चार महीने नहीं होते शुभ कार्य

शास्‍त्रों के अनुसार हरि शब्द सूर्य, चंद्रमा, वायु, विष्णु आदि अनेक अर्थों में प्रयुक्त है। हरिशयन का तात्पर्य इन चार माह में बादल और वर्षा के कारण सूर्य-चंद्रमा के तेज क्षीण हो जाने से हैं। मान्‍यता है क‍ि इस समय पित्त स्वरूप अग्नि की गति शांत हो जाने के कारण शरीरगत शक्ति क्षीण या सो जाती है। यानी क‍ि व्‍यक्ति क‍िसी भी कार्य को करने में खुद को सक्षम नहीं पाता है। इसलिए इन चार महीनों में कोई भी शुभ कार्य वर्जित माना गया है। वहीं अन्‍य मतों के अनुसार चातुर्मास में (मुख्यतः वर्षा ऋतु में) विविध प्रकार के कीटाणु अर्थात सूक्ष्म रोग जंतु उत्पन्न हो जाते हैं। जल की बहुलता और सूर्य का प्रकाश भी भूमि पर काफी कम म‍िलता है। इसलिए इस दौरान क‍िसी भी आयोजन-प्रयोजन से बीमार‍ियों और अन्‍य द‍िक्‍कतों के बढ़ने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।