ईश्‍वर को बाहर तलाशने के बजाए आप खुद की ओर देखें…

मनुष्य जीवन विवशताओं से भरा हुआ है, ऐसा मानने वालों की संख्या आज अनगिनत है। यह धारणा पूरी तरह गलत भी नहीं है। लेकिन क्या सिर्फ यही सच है? या इसके पार भी है कोई दुनिया, जो हमारे सुख-शांति का उपादान जुटाए बैठी हुई है लेकिन हम वहां तक जाने का समय नहीं निकाल पाते। वह दुनिया हमारे भीतर मौजूद है। लेकिन हमारा स्वभाव बन गया है कि हम खुद के भीतर उतरे बिना परिणाम पहले सुना देते हैं। यह परिणाम अगर सत्य पर आधारित हो तो कोई हर्ज नहीं, लेकिन इसकी यात्रा संदेह से शुरु होती है और वहीं आकर खत्म हो जाती है। हम हवा में तलवार भांजकर खुद को योद्धा दिखाने की कोशिश करते हैं। यह जो हमारा छद्म रूप है, यही विवशताओं को जगह उपलब्ध कराता है। इसलिए हम यह याद रखें, ‘बाहर का नहीं जिन्होंने, जीता भीतर का युद्ध, उन्हीं में कोई महावीर बन गया, कोई गौतम बुद्ध।’

यह भी पढ़े: इन 5 योगासनों के द्वारा बढ़ाएं बच्चों की एकाग्रता, स्वामी रामदेव से जानें तरीका

यह कैसा विरोधाभास है कि हम अपने शहर, गांव, मुहल्ले, बिल्डिंग, घर और कमरे के अंदर बंद होने के आदेश को कुछ सहमति और कुछ असहमति के बावजूद अनिवार्य तौर पर मान लेते हैं लेकिन अपने अंदर उतरने से लगभग मना कर देते हैं। यहां तो आदेश देने वाला भी कोई नहीं है। आपको अपनी ही आवाज सुननी है और खुद ही निर्णय करना है। लेकिन आश्चर्य है कि जो सबसे सहज रास्ता है, उसी पर चलने से कतरा रहे हैं। आप एक बार अपने अंदर टंगे दर्पण में खुद को नजर भर देखने और भीतर बह रहे ज्ञान के दरिया में उतरने की कोशिश कीजिए, तब सच का पता चलेगा कि आप कहां हैं और कहां होना चाहिए था। मुश्किल यह है कि हमें गुलामी की आदत पड़ गई है। कभी हम धर्मगुरुओं के गुलाम होते हैं तो कभी राजनीति के। कभी-कभी वैचारिक आग्रहों के भी गुलाम होते हैं, जो हमें दिग्भ्रमित करते रहते हैं। फिर भी हम आदेश की प्रतीक्षा करते हैं।

सबको पता होता है कि क्या गलत और क्या सही है। अपने ज्ञान और अनुभवों से अपना रास्ता चुन सकते हैं लेकिन हम किसी का इंतजार करते हैं कि वह आकर समझ या ज्ञान पर मुहर लगाए। यह खुद के प्रति अविश्वास है जो हमें स्वतंत्र होने से रोकता है और आत्मनिर्भर भी नहीं होने देता है। तब आपका जानना भी बेकार हो जाता है। आपकी हालत दुर्योधन की तरह हो जाती है जो धर्म को जानता है लेकिन आचरण करना नहीं जानता। वह अधर्म को भी जानता है लेकिन छोड़ना नहीं जानता। वह इसका कारण कृष्ण से पूछ सकते थे लेकिन उन्हें पता था कि कृष्ण अपने अंदर झांकने की सलाह देते। दुर्योधन को भी डर था कि आत्मा के अंदर झांकने का मतलब है परमात्मा को अनुभव करना। इसे ही कहा जाता है खुद को खुद से छिपाना।

आप जो हैं, वही बने रहिए और खुद के साथ चलिए। हम समय-समय पर ठहरकर खुद का आकलन जरुर करें कि उम्र भर की दौड़ में हमें मिला क्या? यह भी सोचें कि अब तक जो किया, अच्छा किया या बुरा किया। यह मानें कि आपके अंदर अगर ज्ञान की एक भी बूंद है तो उसे समंदर बनने से कोई रोक नहीं सकता। अगर जीवन में जहर का बहाव हो रहा है तो उसे शंकर की तरह अमृत समझकर पीना सीख लें। हम सब की आत्मा में ही परमात्मा (सुकार्य) विराजमान हैं, बस अपने भीतर देखने की आदत डालनी होगी।